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ToggleSHATILLA EKADASHI 2026 /TIME/DATE/VRAT KATHA/ AARTI
2026 में षटतिला एकादशी 14 जनवरी को मनाई जाएगी, जो कि बुधवार का दिन है. यह एकादशी माघ महीने के कृष्ण पक्ष में आती है. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और तिल का विशेष महत्व होता है.
षटतिला एकादशी की तिथि 13 जनवरी 2026 को दोपहर 3 बजकर 17 मिनट पर शुरू होगी और 14 जनवरी 2026 को शाम 5 बजकर 52 मिनट पर समाप्त होगी.
षट’ का अर्थ है छः और ‘तिला’ का अर्थ है तिल. इस एकादशी में तिल का छः प्रकार से उपयोग किया जाता है, तिल का स्नान, तिल का उबटन, तिल का हवन, तिल का तर्पण, तिल का भोजन और तिल का दान. मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस व्रत का पालन करने से व्यक्ति के जीवन में आर्थिक स्थिरता आती है और दरिद्रता दूर होती है.
माघ माह के कृष्ण पक्ष मे आने वाली इस एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है।
- तिल स्नान
- तिल का उबटन
- तिल का हवन
- तिल का तर्पण
- तिल का भोजन और
- तिलों का दान,
इनके प्रयोग के कारण यह षटतिला एकादशी कहलाती है। इस व्रत के करने से अनेक प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं।
षटतिला एकादशी व्रत कथा!
एक समय नारदजी ने भगवान श्रीविष्णु से प्रश्न किया था और भगवान ने जो षटतिला एकादशी का माहात्म्य नारदजी से कहा: सो मैं आपसे कहता हूँ। भगवान ने नारदजी से कहा कि हे नारद! मैं तुमसे सत्य घटना कहता हूँ। ध्यानपूर्वक उसका श्रवण करो
प्राचीनकाल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदैव व्रत किया करती थी। एक समय वह एक मास तक व्रत करती रही। इससे उसका शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया था।
यद्यपि वह अत्यंत बुद्धिमान थी तथापि उसने कभी देवताओं या ब्राह्मणों के निमित्त अन्न या धन का दान नहीं किया था। इससे मैंने सोचा कि ब्राह्मणी ने व्रत आदि से अपना शरीर शुद्ध कर लिया है, अब इसे विष्णुलोक तो मिल ही जाएगा परंतु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, इससे इसकी तृप्ति होना कठिन है।
भगवान ने सोचा मैं भिखारी के वेश में मृत्युलोक में उस ब्राह्मणी के पास गया और उससे भिक्षा माँगी।
वह ब्राह्मणी बोली: महाराज किसलिए आए हो?
भगवान ने कहा कि उन्हें भिक्षा चाहिए।
इस पर उसने एक मिट्टी का ढेला मेरे भिक्षापात्र में डाल दिया। भगवानउसे लेकर स्वर्ग में लौट आया। कुछ समय बाद ब्राह्मणी भी शरीर त्याग कर स्वर्ग में आ गई। उस ब्राह्मणी को मिट्टी का दान करने से स्वर्ग में सुंदर महल मिला, परंतु उसने अपने घर को अन्नादि सब सामग्रियों से शून्य पाया।
घबराकर वह भगवान पास आई और कहने लगी कि भगवन् मैंने अनेक व्रत आदि से आपकी पूजा की परंतु फिर भी मेरा घर अन्नादि सब वस्तुओं से शून्य है। इसका क्या कारण है?
इस पर भगवान ने कहा कहा: पहले तुम अपने घर जाओ। देवस्त्रियाँ आएँगी तुम्हें देखने के लिए। पहले उनसे षटतिला एकादशी का पुण्य और विधि सुन लो, तब द्वार खोलना। मेरे ऐसे वचन सुनकर वह अपने घर गई। जब देवस्त्रियाँ आईं और द्वार खोलने को कहा तो ब्राह्मणी बोली: आप मुझे देखने आई हैं तो षटतिला एकादशी का माहात्म्य मुझसे कहो।
उनमें से एक देवस्त्री कहने लगी कि मैं कहती हूँ। जब ब्राह्मणी ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना तब द्वार खोल दिया। देवांगनाओं ने उसको देखा कि न तो वह गांधर्वी है और न आसुरी है वरन पहले जैसी मानुषी है। उस ब्राह्मणी ने उनके कथनानुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया। इसके प्रभाव से वह सुंदर और रूपवती हो गई तथा उसका घर अन्नादि समस्त सामग्रियों से युक्त हो गया।
अत: मनुष्यों को मूर्खता त्यागकर षटतिला एकादशी का व्रत और लोभ न करके तिलादि का दान करना चाहिए। इससे दुर्भाग्य, दरिद्रता तथा अनेक प्रकार के कष्ट दूर होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इस प्रकार षटतिला एकादशी व्रत कथा समाप्त हुई।
एकादशी माता की आरती (Ekadashi Mata Ki Aarti)
ॐ जय एकदशी, जय एकदशी, जय एकदशी माता।
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता॥
ॐ जय एकादशी…॥
तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी।
गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी॥
ॐ जय एकादशी…॥
मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष में विश्वतरणी का जन्म हुआ था।
शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई॥
ॐ जय एकादशी…॥
पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है।
शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै॥
ॐ जय एकादशी…॥
नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।
शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै॥
ॐ जय एकादशी…॥
विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ल आमलकी।
पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की॥
ॐ जय एकादशी…॥
चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली।
नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली॥
ॐ जय एकादशी…॥
शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी।
नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी॥
ॐ जय एकादशी…॥
योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।
देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी॥
ॐ जय एकादशी…॥
कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।
श्रावण श्वेत हो और पवित्र आनंद में रहे।
ॐ जय एकादशी…॥
अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ल।
इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला॥
ॐ जय एकादशी…॥
पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।
रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी॥
ॐ जय एकादशी…॥
देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।
पावन मास में करूं विनती पार करो नैया॥
ॐ जय एकादशी…॥
परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।
शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी॥
ॐ जय एकादशी…॥
जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।
जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै॥
ॐ जय एकादशी…॥
EKADASHI KI AARTI
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
परब्रह्म, सर्वोच्च भगवान, आप सभी के भगवान हैं। ॐ जय…॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…
IMPORTANCE
- मोक्ष प्राप्ति:
यह व्रत मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है, यानी इससे व्यक्ति को मृत्यु के बाद मुक्ति मिलती है. - सुख-समृद्धि:
इस व्रत को करने से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि आती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. - पाप मुक्ति:
यह व्रत पापों से मुक्ति दिलाता है और व्यक्ति को सभी कष्टों से छुटकारा दिलाता है. - तिल का महत्व:
षटतिला एकादशी में तिल का छह प्रकार से उपयोग करने का विधान है, जैसे स्नान, उबटन, हवन, तर्पण, भोजन और दान. - दान:
इस दिन तिल का दान करने से पुण्य मिलता है और व्यक्ति को हजार वर्ष तक स्वर्ग का निवास मिलता है. - विष्णु की कृपा:
षटतिला एकादशी के व्रत को करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और साधक के जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है.
व्रत विधि:
- इस दिन व्रत रखने के बाद रात में भगवान विष्णु की आराधना करें.
- रात्रि में जागरण और हवन करें.
- द्वादशी के दिन प्रात:काल उठकर स्नान के बाद भगवान विष्णु को भोग लगाएं.
- पंडितों को भोजन कराने के बाद स्वयं अन्न ग्रहण करें.
- तिल का स्नान, उबटन, हवन, तर्पण, भोजन और दान करें.
- जरूरतमंदों को तिल का दान करें.
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