कार्तिक मास के 12 अध्याय में नारद जी ने भगवान श्री हरि विष्णु की स्तुति महिमा ध्यान किस प्रकार करना चाहिए इसकी व्याख्या की है भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ है भगवान विष्णु का मां लक्ष्मी के साथ गरुण पर बैठकर असुर जालंधर के अंत को लेकर के संवाद चल रहा है इस कथा के अनुसार
देवर्षि नारद ने कहा कि असुर जालंधर राक्षस को समीप आता देखकर के सभी इंद्र आदि देवगन भय से कांप रहे थे और भगवान हरि विष्णु को स्मरण करने लगे तब देवव्रत बोले
हे ईश्वर हे भगवान अपने मत्स्य कुर्मादी कितने ही अवतार लेकर के अपने भक्तजनों का हित और उनका उद्धार किया है आप सदैव ही दुखियों के पालनहार रहे हैं और ब्रह्मा विष्णु महेश रूप घर करके संसार की उत्पत्ति को पालन को और संहार के कार्य को करते आए हैं अपने अपने हाथों में शंख, गदा, तलवार इत्यादि धारण किया है ऐसे भगवान की हम नतमस्तक होकर स्तुति करते हैं
आप माता श्री लक्ष्मी के पतिदेव गरुड़ पर सवारी करने वाले पापियों का सर्वनाश करने वाले पीतांबर वस्त्र धारण करने वाले यज्ञ आदि समस्त क्रियाओं को परिपूर्ण करने और समस्त बाधाओं को दूर करने वाले विष्णु भगवान को हम बारंबार नमस्कार करते हैं
हे प्रभु आप हम सभी को जो राक्षसों से पीड़ित हैं और यह पीड़ा हमारे लिए दुख रूपी पर्वत के समान ब्रज के समान है सूर्य और चंद्रमा दोनों ही आपके नेत्र हैं हम आपको बारंबार नमस्कार करते हैं देवर्षि नारद जी ने कहा कि हे प्रभु व्यक्ति के इस महान संकट को नाश करने वाले स्तोत्र का जो पाठ करेगा उसको भगवान विष्णु की कृपा से कभी भी दुख की प्राप्ति नहीं होगी इस प्रकार समस्त देवतागण भगवान श्री हरि की स्तुति गान करने लगे तब भगवान श्री हरि को देवताओं की विपत्ति का ज्ञान हुआ और वह अपने शैय्या से उठ खड़े हुए और उदास होते हुए गरुड़ पर सवार होकर माता लक्ष्मी से कहने लगे तुम्हारे भाई जालंधर में देवताओं को अत्यधिक कष्ट दिया है देवताओं ने मुझे युद्ध के लिए बुलाया है इसीलिए मैं वहां पर प्रस्थान करुंगा
इस पर माता लक्ष्मी ने कहा है कृपा निधि मैं आपकी पत्नी हूं और हमेशा आपकी भक्ति में ही लगी रहती हूं भगवान श्री हरि ने कहा कि शिव जी के अंश से उत्पन्न होने वाला जालंधर ब्रह्मदेव के वरदान के कारण और तुम्हारी प्रीतिवश जालंधर मेरे वध योग्य नहीं है इसके बाद श्रीहरि गरुण पर सवार होकर शंख ,चक्र, गदा और तलवार हाथ में धारण किए हुए दैत्यों से युद्ध करने के लिए पहुंचे जहां पर सभी देवतागण उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे
और भगवान की स्तुति करने लगे फिर वायु के वेग से पीड़ित होकर और वरुण के पंखों द्वारा प्रताड़ित आकाश में इधर-उधर होने लगे जिस तरह से वायु से कष्ट प्रकार मेघ आकाश में उड़ते हैं वहीं राक्षसों को इतना अधिक कष्ट में देखकर जालंधर को अत्यधिक क्रोध आया और वह भगवान विष्णु के समीप पहुंच गया
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