KARTIK MAAS KI KATHA ADHYAYA 14

राजा पृथ्वी ने हाथ जोड़कर के देव मुनि नारद जी से भगवान की पूजा उनकी महिमा सुनने की इच्छा प्रकट की इस पर नारद जी ने कहा जो भगवान की श्रद्धा पूर्वक भजन भक्ति भाव करता है उसकी महिमा का क्या ही वर्णन किया जा सकता है लेकिन फिर भी मैं एक प्राचीन इतिहास कहता हूं उसे ध्यान पूर्वक सुनो
नारद जी ने कहा कालिंदी पर्वत पर दीर्घापुर नगर में सुबाहु नाम का धार्मिक राजा राज्य करता था वह अपनी प्रजा को अपने पुत्र के समान पलटा था उसके धूम्र केश नाम का एक पुत्र था जो की चोर , दुराचारी, जुआरी था
पुत्र के इस बर्ताव को देखकर के राजा ने उसे अनेक प्रकार से यातनाएं दी परंतु वह किसी प्रकार से भी नहीं मान रहा था एक दिन खेलते हुए उसकी गेंद छोटी रानी के महल में जा गिरी जब वह गेंद लेने के लिए महल में गया तो उसकी विमाता छोटी रानी उसे पर अत्यधिक मोहित हो गई जब राजा को इस बात का ज्ञान हुआ तो उन्होंने अपने पुत्र को राज्य से बाहर निकाल दिया अब राजकुमार वन में ही प्रतिदिन तामसिक भोजन करने लगा और दुराचारी हो गया चोरी करके जो भी उसे धन प्राप्त होता वह सब वह लुटा देता इस प्रकार करते हुए अनेक वर्ष व्यतीत हो गए

इस प्रकार भटकते भटकते वह वृंदावन पहुंच गया वृंदावन में धूम्र केश ने एक विष्णु भक्त को देखा जो की कार्तिक मास में वृंदावन में रहकर भगवान का पूजन कर रहा था और केवल कंदमूल फल खाता था वह भक्त प्रतिदिन भगवान से प्रार्थना अर्चना करता था कि इस दुख रुपी संसार में उसकी रक्षा करें ऐसा कहते हुए वह भगवान जी को बारंबार प्रणाम भी करता कभी प्रेम में मग्न होकर रोता तो कभी भगवान के समक्ष गान और नृत्य आदि भी करने लगता धूम्रकेश ने जब उसकी यह समस्त क्रियाएं देखी तो रात्रि को घर आकर के मिट्टी की एक मूर्ति बनाकर के वैसे ही सब करने लगा और अंत में स्तुति करके ही वैश्या के घर में सो गया,
देव योग से राजा के दूत इस समय वहां आ गए और धूम्रकेश उनके हाथ से मारा गया इधर यमदूत उसको महा पापी समझ करके यमराज के पास लेकर गए धूमकेश को देखते ही यमराज अपने सिंहासन से खड़े हो गए और अर्ध आदि देखकर के उसका सादर सत्कार किया फिर अपने दूतों को फटकारते हुए कहा कि उन्हें यह आज्ञा दी हुई है कि विष्णु भक्तों को यहां पर नहीं लेकर आना है फिर धूम्रकेश को क्यों यहां पर लेकर आए उसने कार्तिक मास में वृंदावन के धाम में मजाक में ही पूजा अर्चना की हो फिर भी वह बैकुंठ का अधिकारी है

बैकुंठ में भेजने के पूर्व यमराज ने धूमकेतु को अपने निकट बैठ करके यह कहा कि चाहे तुमने मजाक में ही भगवान की पूजा की हो पर फिर भी तुम स्वर्ग के अधिकारी हो तुमने जीवन में अनेक पाप दुष्कर्म आदि किए हैं जिसके कारण तुम नरक के अधिकारी हो परंतु तुमने कार्तिक मास में मन से भगवान की जो पूजा अर्चना की है उसके द्वारा तुम्हें बैकुंठ की प्राप्ति हो गई कार्तिक मास में की गई पूजा सार्थक होती है जहां पर भगवान शालिग्राम है वहीं पर गंडकी नदी है धूमकेश को शास्त्रों का कुछ भी ज्ञान नहीं था उसने यमराज से हाथ जोड़कर कहा कि भगवान सब नदियों को छोड़कर गंडकी को कैसे प्राप्त हुए
यमराज जी ने कहा कि वेदशिरा नामक ऋषि समस्त लोगों के हितों की कामना के लिए गंगा जी के तट पर तपस्या कर रहे थे उनके इस घोर तप से भयभीत होकर इंद्र ने ऋषि की तपस्या भंग करने के लिए मंजूघोष नामक अप्सरा को उनके पास भेजा वह क्रीडा करती हुई अपने रूप और यौवन का प्रदर्शन करते हुए हाव-भाव दिखने लगी
फिर उसने मुनि के चरणों का स्पर्श किया जिसके कारण मुनि रोमांचित हो गए और मुनि को अपने वश में जान करके उसे अपनी दोनों भुजाएं उनके गले में डाल दिए इस पर क्रोधित होकर मुनि ने उसे श्राप दिया तुम मुझे इस संसार सागर में डालने के लिए क्रीडा कर रही हो इसीलिए तुम नदी बन जाओ मुनि का ऐसा श्राप सुनकर मंजूघोश अत्यधिक रोने लगी और उनसे प्रार्थना करके कहने लगी कि मैं श्राप के योग्य नहीं हूं आप मुझे क्षमा कर दीजिए उनकी प्रार्थना से मुनि जी ने कहा कि भगवान विष्णु वृंदा के श्राप वर्ष शीला रूप होकर तुम गंडकी में स्थित रहोगी तब तुम भगवान को धारण करने वाली होगी इस प्रकार मेरे द्वारा दिया गया या श्राप वरदान से भी अधिक श्रेष्ठ सिद्ध होगा , अंत में यमराज जी ने कहा है राजकुमार अब तुम विष्णु लोग को जाओ वही हरि चरणों में तुम्हें स्थान मिलेगा कार्तिक मास में एक दिन पूजा करने का यह परिणाम नारद जी ने बताते हुए अपनी वाणी को विराम दिया

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