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ToggleKAMADA EKADASHI VRAT KATHA / कामदा एकादशी व्रत कथा
कामदा एकादशी की तिथि
कामदा एकादशी की तिथि 7 अप्रैल, 2025 को रात 8 बजे से शुरू होकर 8 अप्रैल, 2025 को रात 9:12 बजे खत्म होगी.
कामदा एकादशी के दिन समय 9 अप्रैल, 2025 को सुबह 6 बजे से 8:32 बजे तक होगा.
कामदा एकादशी के दिन मौसमी फल खाए जा सकते हैं.
सब्ज़ियों में कट्टू, आलू, नारियल, और शकरकंद वगैरह खाए जा सकते हैं.
हिंदू कैलेंडर में हर 11वीं तिथि को एकादशी व्रत रखा जाता है। एक महीने में दो एकादशी व्रत होते हैं, एक शुक्ल पक्ष में और दूसरा कृष्ण पक्ष में। भगवान विष्णु के भक्त उनका आशीर्वाद पाने के लिए एकादशी व्रत रखते हैं।
एकादशी व्रत तीन दिनों तक चलता है। भक्त व्रत के दिन से एक दिन पहले दोपहर में एक बार भोजन करते हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अगले दिन पेट में कोई बचा हुआ भोजन न हो। भक्त एकादशी के दिन कठोर व्रत रखते हैं और अगले दिन सूर्योदय के बाद ही व्रत तोड़ते हैं। एकादशी व्रत के दौरान सभी प्रकार के अनाज और अनाज खाना वर्जित है।
भक्त अपनी इच्छा और शारीरिक शक्ति के अनुसार बिना पानी के, केवल पानी के साथ, केवल फलों के साथ, एक बार लेटेक्स भोजन के साथ व्रत रखने का विकल्प चुन सकते हैं। हालाँकि व्रत शुरू करने से पहले यह तय कर लेना चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा: हे धर्मराज! चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कामदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। एक समय की बात है, यही प्रश्न राजा दिलीप ने गुरु वशिष्ठजी से किया था और जो समाधान उन्होंने बतलाया, वही मैं तुमसे कह रहा हूँ।
कामदा एकादशी के फ़ायदे:
1-इस दिन व्रत करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं.
2-इस दिन व्रत करने से घर में सुख-समृद्धि आती है.
3-इस दिन व्रत करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है.
4-इस दिन व्रत करने से ब्रह्महत्या और अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है.
5-इस दिन व्रत करने से पिशाचत्व जैसे दोषों का नाश होता है.
6-इस दिन व्रत करने से हर तरह के दुख और कष्टों से मुक्ति मिलती है.
7-इस दिन व्रत करने से पारिवारिक जीवन में समस्याएं नहीं आतीं.
8-इस दिन व्रत करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.
कामदा एकादशी व्रत नियम
कामदा एकादशी व्रत के कुछ नियम ये हैं:
- इस दिन किसी से अपशब्द न बोलें और बड़ों का सम्मान करें.
- इस दिन व्रत रखने वाले को दिन भर कुछ नहीं खाना चाहिए.
- इस दिन मांस-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए.
- इस दिन बाल-नाखून नहीं कटवाने चाहिए.
- इस दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए.
- इस दिन किसी भी पेड़ के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए.
- इस दिन दोपहर में नहीं सोना चाहिए.
- इस दिन मन में नकारात्मक विचार नहीं लाने चाहिए.
- इस दिन किसी से क्रोध या द्वेष नहीं रखना चाहिए.
- इस दिन जरूरतमंदों को अन्न, धन, और जल का दान करना चाहिए.
- इस दिन भजन-कीर्तन करना चाहिए.
- इस दिन भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करना चाहिए.
- इस दिन रात्रि में जागरण करना चाहिए.
- इस दिन द्वादशी को ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए.
- इस दिन व्रत का पारण तुलसी के पत्ते से करना चाहिए.
कामदा एकादशी को फलदा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. यह हिंदू पंचांग के मुताबिक, साल की पहली एकादशी होती है. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है.
कामदा एकादशी व्रत कथा!
प्राचीनकाल में भोगीपुर नामक एक नगर था। वहाँ पर अनेक ऐश्वर्यों से युक्त पुण्डरीक नाम का एक राजा राज्य करता था। भोगीपुर नगर में अनेक अप्सरा, किन्नर तथा गन्धर्व वास करते थे। उनमें से एक जगह ललिता और ललित नाम के दो स्त्री-पुरुष अत्यंत वैभवशाली घर में निवास करते थे। उन दोनों में अत्यंत स्नेह था, यहाँ तक कि अलग-अलग हो जाने पर दोनों व्याकुल हो जाते थे।
एक समय पुण्डरीक की सभा में अन्य गंधर्वों सहित ललित भी गान कर रहा था। गाते-गाते उसको अपनी प्रिय ललिता का ध्यान आ गया और उसका स्वर भंग होने के कारण गाने का स्वरूप बिगड़ गया। ललित के मन के भाव जानकर कार्कोट नामक नाग ने पद भंग होने का कारण राजा से कह दिया। तब पुण्डरीक ने क्रोधपूर्वक कहा कि तू मेरे सामने गाता हुआ अपनी स्त्री का स्मरण कर रहा है। अत: तू नरभक्षी दैत्य बनकर अपने कर्म का फल भोग।
पुण्डरीक के श्राप से ललित उसी क्षण महाकाय विशाल राक्षस हो गया। उसका मुख अत्यंत भयंकर, नेत्र सूर्य-चंद्रमा की तरह प्रदीप्त तथा मुख से अग्नि निकलने लगी। उसकी नाक पर्वत की कंदरा के समान विशाल हो गई और गर्दन पर्वत के समान लगने लगी। सिर के बाल पर्वतों पर खड़े वृक्षों के समान लगने लगे तथा भुजाएँ अत्यंत लंबी हो गईं। कुल मिलाकर उसका शरीर आठ योजन के विस्तार में हो गया। इस प्रकार राक्षस होकर वह अनेक प्रकार के दुःख भोगने लगा।
जब उसकी प्रियतमा ललिता को यह वृत्तान्त मालूम हुआ तो उसे अत्यंत खेद हुआ और वह अपने पति के उद्धार का यत्न सोचने लगी। वह राक्षस अनेक प्रकार के घोर दुःख सहता हुआ घने वनों में रहने लगा। उसकी स्त्री उसके पीछे-पीछे जाती और विलाप करती रहती।
एक बार ललिता अपने पति के पीछे घूमती-घूमती विन्ध्याचल पर्वत पर पहुँच गई, जहाँ पर श्रृंगी ऋषि का आश्रम था। ललिता शीघ्र ही श्रृंगी ऋषि के आश्रम में गई और वहाँ जाकर विनीत भाव से प्रार्थना करने लगी।
उसे देखकर श्रृंगी ऋषि बोले: हे सुभगे! तुम कौन हो और यहाँ किस लिए आई हो?
ललिता बोली: हे मुने! मेरा नाम ललिता है। मेरा पति राजा पुण्डरीक के श्राप से विशालकाय राक्षस हो गया है। इसका मुझको महान दुःख है। उसके उद्धार का कोई उपाय बतलाइए।
श्रृंगी ऋषि बोले: हे गंधर्व कन्या! अब चैत्र शुक्ल एकादशी आने वाली है, जिसका नाम कामदा एकादशी है। इसका व्रत करने से मनुष्य के सब कार्य सिद्ध होते हैं। यदि तू कामदा एकादशी का व्रत कर उसके पुण्य का फल अपने पति को दे तो वह शीघ्र ही राक्षस योनि से मुक्त हो जाएगा और राजा का श्राप भी अवश्यमेव शांत हो जाएगा।
मुनि के ऐसे वचन सुनकर ललिता ने चैत्र शुक्ल एकादशी आने पर उसका व्रत किया और द्वादशी को ब्राह्मणों के सामने अपने व्रत का फल अपने पति को देती हुई भगवान से इस प्रकार प्रार्थना करने लगी: हे प्रभो! मैंने जो यह व्रत किया है इसका फल मेरे पतिदेव को प्राप्त हो जाए जिससे वह राक्षस योनि से मुक्त हो जाए।
एकादशी का फल देते ही उसका पति राक्षस योनि से मुक्त होकर अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त हुआ। फिर अनेक सुंदर वस्त्राभूषणों से युक्त होकर ललिता के साथ विहार करने लगा। उसके पश्चात वे दोनों विमान में बैठकर स्वर्गलोक को चले गए।
वशिष्ठ मुनि कहने लगे: हे राजन्! इस व्रत को विधिपूर्वक करने से समस्त पाप नाश हो जाते हैं तथा राक्षस आदि की योनि भी छूट जाती है। संसार में इसके बराबर कोई और दूसरा व्रत नहीं है। इसकी कथा पढ़ने या सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
एकादशी माता की आरती (Ekadashi Mata Ki Aarti)
ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता।
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता॥
ॐ जय एकादशी…॥
तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी।
गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी॥
ॐ जय एकादशी…॥
मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।
शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई॥
ॐ जय एकादशी…॥
पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है।
शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै॥
ॐ जय एकादशी…॥
नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।
शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै॥
ॐ जय एकादशी…॥
विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी।
पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की॥
ॐ जय एकादशी…॥
चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली।
नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली॥
ॐ जय एकादशी…॥
शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी।
नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी॥
ॐ जय एकादशी…॥
योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।
देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी॥
ॐ जय एकादशी…॥
कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।
श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए॥
ॐ जय एकादशी…॥
अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।
इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला॥
ॐ जय एकादशी…॥
पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।
रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी॥
ॐ जय एकादशी…॥
देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।
पावन मास में करूं विनती पार करो नैया॥
ॐ जय एकादशी…॥
परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।
शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी॥
ॐ जय एकादशी…॥
जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।
जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै॥
ॐ जय एकादशी…॥
EKADASHI KI AARTI
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥
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