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कार्तिक मास के 19वीं अध्याय इस प्रकार है ।
इसमें एक राजा की कहानी है जो की धार्मिक और भक्ति में जीवन में अत्यधिक रुचि रखती है । उनकी प्रजा सुखी और खुशहाल थी
राजा ने कार्तिक मास में विशेष रूप से पूजा और व्रत आदि किया था और उन्होंने अपनी प्रजा को भी इसमें भाग लेने के लिए उत्साहित किया, इस पूजा और व्रत के द्वारा राजा ने भगवान विष्णु और भगवान शिव की कृपा प्राप्त की थी कथा में यह भी बताया गया है कि कैसे इस पूजा से राजा और उनकी प्रजा को अत्यधिक पुण्य फलों की प्राप्ति हुई और उनके जीवन में सुख समृद्धि का वास हुआ ।
राजा पृथु ने पूछा नारद जी से कि भगवान ने वहां जाकर के क्या किया और जलंधर की पत्नी का पतिव्रता धर्म कैसे नष्ट हुआ
इस पर नारद जी बोले जालंधर के नगर में जाकर विष्णु जी ने उनकी स्त्री वृंदा का पति व्रत भंग करने का विचार किया था वह उस नगर के बगीचे में जाकर ठहर गए,यह सब भगवान विष्णु की माया थी और उनकी माया से जब वृंदा ने रात्रि में स्वप्न देखा कि उनके पति नग्न होकर सर पर तेल लगाएं महिष पर चढ़े हुए हैं वह काले रंग के फूलों की माला पहने हुए हैं और उसके चारों तरफ हिंसक जीव जंतु है वह अंधकार में दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है उसने नगर को अपने साथ समुद्र में डूबा हुआ और इस प्रकार से स्वप्न देखें जल्द ही वह सपनों का विचार करने लगी कई बार सूर्य देव को उदित होते हुए देखा तो सूर्य में उन्हें एक छेद दिखाई दिया तथा वह कांतिहीन हो गई उसने जाना कि यह सब अनिष्ट हो रहा है और इससे प्रभावित हुई कहीं भी उसे शांति प्राप्त न हुई फिर वह अपनी दो सखियों के साथ बगीचे में गई वहां भी उसे शांति प्राप्त न हुई फिर वह जंगल में निकल गई उसने सिंह के समान दो भयंकर राक्षसों को दिखा जिससे वह अत्यधिक भयभीत हो गई इस समय अपने शिष्यों सहित शांत मोनी तपस्वी वहां आ गई और प्रभावित वृंदा उसके गले में हाथ डालकर उसने रक्षा की प्रार्थना की ,मुनि ने अपने एक ही हुंकार से राक्षसों को भगा दिया वृंदा का आश्चर्य का कोई ठिकाना ना रहा और वह भय से मुक्त हो गई और मुनि नाथ को हाथ जोड़कर प्रणाम करके विनती करने लगी फिर उसने मुनि से अपने पति के विषय में प्रश्न किया इस समय दो वानर मुनि के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए और जो ही मुनि ने संकेत करके त्यों ही उड़कर आकाश मार्ग से चले गए फिर जलंधर का सिर और धड़ मुनि के आगे आ गए तब अपने पति को मृत समझ कर वृंदा मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी और अनेक प्रकार से विलाप करने लगी तब उसे मुनि से कहा की है कृपा निधि आप इन्हें जीवित कर दीजिए पतिव्रता दैत्य पत्नी ऐसा बोलते हुए मुनीश्वर के चरणों पर गिर पड़ी तब मुनि ने कहा कि यह शिवजी द्वारा युद्ध में मारा गया है जीवित नहीं हो सकता है क्योंकि जिसे भगवान शिव मार देते हैं वह कभी जीवित नहीं हो सकता है पर शरणागत की रक्षा करना हमारे धर्म है इसलिए मैं इसे जीवित कर देता हूं नारद जी ने कहा वह मुनि भगवान विष्णु ही थे जिन्होंने यह सब माया फैला करके रखी थी वह वृंदा के पति को जीवित करके अंतर ध्यान हो गए, जलंधर ने उठकर बृंदा को गले लगाया वृंदा भी पति को जीवित देखकर के अत्यंत खुश हुई और एक बार संभोग काल के अंत में प्राप्त विष्णु को देखकर उन्हें बोलने लगी कि आप पराई स्त्री से गमन करने वाले आपके शील को धिक्कार है आप मायावी तपस्वी थे इस प्रकार क्रोधित होकर वृंदा ने अपने तेज को प्रकट करते हुए भगवान विष्णु को श्राप दिया तुमने माया से दो रक्षा मुझे दिखाएं वही दोनों राक्षस तुम्हारी स्त्री का हरण करेंगे ,सर्वेश्वर जो तुम्हारा शिष्य बना है वह भी तुम्हारा साथ ही रहेगा जब तुम अपनी पत्नी के वियोग में दुखी होकर तपोगे इस समय वानर तुम्हारी सहायता करेंगे ऐसा कहते हुए पतिव्रता वृंदा ने अग्नि में प्रवेश करके आत्मदाह कर लिया ।
वृंदा के शरीर का तेज पार्वती जी के शरीर में चला गया पतिव्रता के प्रभाव से वृंदा ने मुक्ति प्राप्त की यह कथा हमें सिखाती है कि धर्म भक्ति और सत्य का पालन करने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं जो व्यक्ति सच्चे मन से ईश्वर की उपासना करता है उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होती है समाज और प्रजा की भलाई के लिए राजा का कर्तव्य बहुत महत्वपूर्ण होता है राजा अपनी प्रजा के साथ मिलकर जो पूजा व्रत किया उससे न केवल उसकी व्यक्तिगत लाभ हुआ किंतु पूरे समाज की ही भलाई हुई सामूहिक प्रयास से समाज में सकारात्मक लाई जाती है ।
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