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ToggleKARTIK MAAS KI KATHA ADHYAYA 20
कार्तिक मास का 20 वा अध्याय इस प्रकार है ।
इस प्रकार से समस्त ब्रह्म आदि देवताओं ने नतमस्तक होकर के भगवान शिव की आराधना और स्तुति करना आरंभ कर दिया । और कहने लगे है देवों के देव ! आप इस प्रकृति से भी परे हैं पार ब्रह्म हैं परमेश्वर है निर्गुण है निर्विकार है
हे प्रभु, हम ब्रह्मा और समस्त देवता आपके दास है शंकर भोलेनाथ हम पर प्रसन्न होकर हमारी रक्षा कीजिए हम आपकी प्रजा है और सदैव आपकी शरण में रहते हैं ।
नारद जी राजा पृथु से बोले इस प्रकार से ब्रह्मा और समस्त देवताओं एवं मुनियों ने जब भगवान शंकर की अनेक प्रकार से स्तुति गान इत्यादि करके उनके चरण कमल का ध्यान करके नमस्कार किया, तब भगवान शिव शंकर भोलेनाथ सभी देवताओं को वरदान देकर वहां से अंतर ध्यान हो गए और भगवान शिव का यश की गाथा गाते हुए सभी देवता प्रसन्न होते हुए अपने अपने लोक को चले गए ।
भगवान शंकर के साथ सागर पुत्र जालंधर का युद्ध चरित्र अत्यधिक पुण्य प्रदान करने वाला और सारे पापों को नष्ट करने वाला है । यह सभी सुखों को देने वाला और आनंदमय जीवन प्रदान करता है इन दोनों ही कथाओं को पढ़ने और सुनने मात्र से ही समस्त सुखों को भोग करके अंत में मनुष्य अमर पद को प्राप्त होता है ।
कथा के अनुसार राजा पृथु ने देवर्षि नारद से पूछा ,
कि इसके बाद युद्ध में क्या हुआ और वह व्यक्ति जलंधर किस प्रकार से मारा गया नारद जी बोले जब गिरिजा वहां से अदृश्य हो गई और गन्धर्वी माया भी विलीन हो गई तब भगवान वृषभ ध्वज चैतन्य हो गए और जलंधर से युद्ध करने लगे जलंधर शंकर के बाणों को काटने लगा परंतु जब काट ना सका तब उसने मोहित करने के लिए माया की पार्वती का निर्माण करके अपने रथ पर बांध लिया तब अपनी प्रिय पार्वती को इस प्रकार कष्ट में देख करके शंकर जी अति व्याकुल हो गए शंकर जी ने भी इसके पश्चात रौद्र रूप धारण कर लिया उनके रौद्र रूप को देखकर के कोई भी उनके सामने खड़ा ना हो सका और सब भागने लगे यहां तक की शुभ , निशुंभ भी व्याकुल हो उठे शिव जी ने शुभ निशुंभ को श्राप दिया और उनसे कहा कि उन्होंने घोर अपराध किया है तुम युद्ध से भाग रहे हो युद्ध से भागने पर अब मां गौरी ही तुमको अवश्य मारेगी शिव जी के ऐसा कहने पर सागर पुत्र जालंधर क्रोध की अग्नि में प्रज्वलित हो उठा उसने शिवजी पर घोर बाणों की वर्षा कर दिया तब उसे दैत्य की ऐसे उद्दंडता को देखकर शंकर जी अत्यधिक क्रोधित होकर के अपने चरणागुष्ट से बने हुए सुदर्शन चक्र को चलकर उसका सिर काट दिया ।
उसका सिर एक भारी गर्जना के साथ पृथ्वी पर गिर पड़ा और उसके शरीर के दो टुकड़े हो गए और उसके रक्त से संगम भूमि व्याप्त हो गई ।
शिव भगवान की आज्ञा से उसका रक्त और मांस महारौरव में जाकर रक्त का कुंड बन गया तथा उसके शरीर का तेज निकाल कर शंकर जी में प्रवेश कर गया जैसे वृंदा का तेज गौरी के शरीर में प्रविष्ट हुआ था । जलंधर को मरा देखकर देवता और सब गंधर्व अति प्रसन्न हो गए और सब ने सुख माना ।
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