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कार्तिक मास की कथा – 8
एक समय भगवान श्रीकृष्ण की महिमा सुनने के इच्छुक युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से प्रश्न किया –
“हे माधव! कार्तिक मास का क्या महत्व है? कृपा करके बताइए कि इस मास में किया गया कौन-सा साधन सर्वोत्तम फल देता है।”
भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया –
“हे धर्मराज! कार्तिक मास समस्त महीनों में श्रेष्ठ है। इस मास में किया गया दीपदान, स्नान, व्रत और हरिनाम-स्मरण मनुष्य को जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति प्रदानकर देता है।
पौराणिक कथा के अनुसार — एक बार एक चांडाल स्त्री थी जो बहुत पाप कर्म करती थी। एक दिन संयोगवश उसने कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की रात्रि में तुलसी के नीचे दीप जला दिया। यद्यपि उसका मन किसी भक्ति भाव में नहीं था, फिर भी अगले जन्म में वह दिव्य स्वरूप वाली राजकन्या हुई और अंततः विष्णुधाम को प्राप्त हुई।
इससे सिद्ध होता है कि कार्तिक मास में अनजाने में किया गया छोटा-सा पुण्य भी मनुष्य को मोक्ष दिलाने वाला होता है।”
—
कार्तिक मास के नियम व विधियाँ इस प्रकार है
- प्रातः स्नान – गंगा, यमुना या किसी पवित्र नदी/तालाब में स्नान करें। यदि यह संभव न हो तो गंगाजल मिलाकर स्नान अवश्य करें। इसके पश्चात ही पूजा अर्चना करें
- तुलसी पूजन – तुलसी को जल, पुष्प, दीप अर्पित करें। तुलसी दल भगवान विष्णु को अर्पित करें।
- दीपदान – प्रातः और संध्या को मंदिर, तुलसी, नदी किनारे या घर में दीपक जलाएँ।
- व्रत – एक समय सात्त्विक भोजन ग्रहण करें, अन्न त्याग कर फलाहार भी किया जा सकता है।
- हरिनाम जप – “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
- दान – ब्राह्मणों, साधुओं या जरूरतमंद को वस्त्र, अन्न, दीपक, तिल, गुड़, स्वर्ण आदि का दान करें।
- एकादशी पालन – विशेषकर कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) को व्रत रखें।
कार्तिक मास में विशेष उपाय
- तुलसी के पास दीपक जलाएँ – परिवार में सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य बना रहता है।
- पीपल पूजन – पीपल के वृक्ष पर जल और दीप अर्पण करने से पितृदोष और ग्रहदोष की शांति होती है
- गाय सेवा – गाय को हरा चारा, गुड़ या रोटी खिलाने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं।
- कपूर आरती – संध्या समय कपूर जलाकर आरती करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा की समाप्त होती है।
- हरिनाम संकीर्तन – घर में “हरे कृष्ण हरे राम” या गीता पाठ करने से दिव्य आशीर्वाद मिलता है।
- अन्नदान – निर्धनों को भोजन कराने से पाप क्षीण होते हैं और पुण्य में वृद्धि होती है।
- **शंख जल अर्पण** – विष्णु मंदिर में शंख से जल अर्पित करने से माता लक्ष्मी कृपा प्राप्त होती है।
कार्तिक मास की आठवीं अध्याय की कथा इस प्रकार है
नारद जी कहने वालों है राजा पृथु – जालंधर ने हमारा बड़ा ही आदर और सत्कार किया भक्ति भाव से पूजन करके कहने लगा की -हे महाराज – आपका यहां पर किस प्रकार आगमन हुआ है मेरे लिए क्या आदेश है हमने कहा – हे दैत्य राज मैं कैलाश गया था वहां पार्वती माता सहित अवधूत शिव और उनका वैभव देखा तो अत्यंत आश्चर्य चकित हो गया कि क्या ऐसा वैभव और किसी का भी हो सकता है ?
ऐसा विचार करके तीनों लोकों में भ्रमण करता हुआ अंत में यहां पर आया हूं यहां आकर तुम्हारे समृद्धि भी देख ली तुम्हारे और शिव के वैभव में कोई अंतर नहीं है किंतु तुम्हारे वैभव में स्त्री नहीं है भस्म लेपन करने वाले,राग रहित कामदेव के शत्रु शिव के पास स्त्री रत्न जैसी पार्वती है वैसे तुम्हारे पास अनेक सुंदरिया है परंतु उनमें से कांतिमान पार्वती की तुलना कोई भी नहीं कर सकती है
नारद जी कहने लगे कि हे राजा – हम तो इतना कह कर वहां से चले गए परंतु जालंधर ने पार्वती जी की इतनी सुंदरता सुनकर के काम से पीड़ित हो राहु को बुलाकर के शिव के पास भेजा, राहु इस समय चंद्र के समान उज्जवल कैलाश पर द्वारपाल नदी द्वारा रोके जाने तथा शिव जी के सामने उपस्थित किए जाने पर उनसे कहने लगा कि हे शिव – तीनों लोकों के नाथ और सब रतन के स्वामी जालंधर की आज्ञा तुम अच्छे से सुनो
श्मशान निवासी तथा नरमुंडों की माला धारण करने वाले जटाजूटधारी तुम्हारे जैसे अवधूत के पास पार्वती जैसी परम सुंदरी स्त्री शोभा नहीं देती मैं तीनों लोकों का नाथ सब रतन का स्वामी हूं क्योंकि पार्वती भी स्त्री रत्न है अतः वह मेरे साथ ही शोभा दे सकती है तेरे जैसे भस्म धारण करने वाले योगी के पास नहीं रह सकती
नारद जी कहने वालों की हे राजा पृथु – राहु के इतना कहते ही शिवजी भगवान ने अपनी भौहो में से एक अत्यंत भयंकर पुरुष को उत्पन्न किया जिसका सिंह के समान मुख था जलती हुई अग्नि के समान लाल लाल नेत्र करते हुए जिसके शरीर पर खड़े बाल थे , उत्पन्न होते ही जब वह राहु को खाने के लिए आगे बढ़ा तो राहु भयभीत होकर कहने लगा की हे शिव – मैं ब्राह्मण हूं और दूत भी ,अतः तुम मुझको मत मारो ऐसा कहने पर शिव ने राहु को पकड़ कर आकाश में फेंक दिया
तब वह भयंकर पुरुष राहु को छोड़कर शिव के पास आया और कहने लगा कि मैं भूखा हूं मुझे खाने के लिए कुछ दो तब शिव जी ने कहने लगे कि तुम अपने हाथ पैरों को खाओ जब वह हाथ पैरों को खाता हुआ सारे धड़ को खा गया,केवल मुख ही शेष रह गया था तब शिवजी ने कहा कि तुमने मेरी आज्ञा का पालन किया है अतः आज से तुम्हारा नाम कीर्ति मुख होगा, और तुम हमारे द्वारपाल होंगे,पहले तुम्हारी पूजा होगी इसके बाद हमारी पूजा होगी तुम्हारी पूजा के बिना हमारी पूजा निष्फल मानी जाएगी
उधर राहु आकाश में जाकर बर्बर देश में जा गिरा राहु की ऐसी दशा देख कर जालंधर को बड़ा क्रोध आया और वह अपने एक करोड़ देत्यो की सेना लेकर आक्रमण के लिए पूरी तरीके से तैयार होकर बाहर आया बाहर निकलते ही उसे सामने एक आंख वाले शुक्राचार्य राहु मिले
उसके साथ अनेक अपशगुन होने लगे परंतु फिर भी वह ना रुका और इस प्रकार दैत्य सी पूरे आकाश में छा गई जब देवताओं ने जालंधर की कैलाश पर चढ़ाई देखी तो जाकर शिवाजी महाराज को इसकी खबर दे दी श्री शिव जी ने इस समय भगवान का स्मरण किया और स्मरण करते ही भगवान विष्णु वहां उपस्थित हो गए तब शिव जी ने कहा कि भगवान अपने देवताओं को पीड़ा देने वाले इस दैत्य को क्यों नहीं मारा ?
इतना ही नहीं आपने वहां जाकर उसके घर में विराजमान हो गए, विष्णु भगवान कहने लगे कि यह आपके अंश से उत्पन्न हुआ है और लक्ष्मी जी का भाई है इस कारण हमने इसको नहीं मारा यह आपके हाथों से ही मर जाएगा तब शिवजी बोले कि वह तेजस्वी दैत्य हमसे ऐसे नहीं मारा जाएगा अब इसको करने के लिए अपना-अपना तेज दीजिए तब विष्णु सहित सब देवताओं में अपना अपना तेज दिया इसके बाद शिवजी इस तेज को इकट्ठा करके ज्वालामयी सुदर्शन चक्र बनाए और वज्र बनाकर जालंधर से युद्ध करने को तैयार हुए शिव जी के बहुत गणो की सेवा में समस्त देवगन भी आकर सम्मिलित हो गए
उधर कैलाश के निकट जालंधर पहुंच इधर कीर्तिमुख , नंदी आदि सब गण और देवसेना भी मैदान में आये तब जालंधर और देवताओं का घोर संग्राम होने लगा ,गणो की इस मार से घबराकर दैत्य सेना अब भागने लगी
देत्यो की सेना को इस प्रकार भागते हुए देखकर जालंधर के सेनापति शंभू और निशुंभ तथा कालनेमि आगे आये , इनको देखकर देत्यो ने अनेक प्रहार किया जिससे देव सेना मार खाकर भागने लगी तब गणेश और शुम्भ का महाघोर संग्राम हुआ इस बार अपनी सेना को भागता देखकर जालंधर स्वयं रण क्षेत्र में आया
देवसेना की ओर से वीरभद्र अनेक प्रकार के प्रहार करता हुआ जालंधर पर प्रहार करता रहा तब जालंधर अत्यधिक क्रोध में आकर अपना परिध उसे पर दे मारा और उसके रथ की पताका भी काट दी साथ ही साथ जालंधर ने बाण – वर्षा करके देवसेना में भगदड़ मचा दी
अपनी सेना की ऐसी दशा देखकर शिवाजी खडगारोमा का सिर काटकर पृथ्वी पर गिरा दिया तब जालंधर पैदल ही अपना खड़क लेकर शिवजी पर प्रहार करने के लिए आगे आया ,शिव जी ने उसके रथ के घोड़े और सारथी को भी मार गिराया ,शिव जी ने उसकी छाती पर एक मुक्का मारा जिससे वह विह्वल हो गया इस प्रकार शिव जी ने उसे पर प्रहार किया
दैत्य ने जब देखा कि शिव तो अजय है तो उसने गंधर्व माया रचीऔर अप्सराय उसमें नाचने लगी गान करने लगी शिवजी इस माया में फसकर नाचने और गाने लगी जालंधर दैत्य श्री शिव जी को माया में फंसा कर महादेव का रूप धारण करके पार्वती जी के पास गया और पार्वती जी का रूप देखकर कामातुर हो गया
पार्वती महादेव को आता देखकर खड़ी हो गई परंतु तत्काल ही राक्षसी माया को समझ कर वहां से अंतर ध्यान हो गई तब जालंधर फिर से युद्ध भूमि में आया उधर जालंधर के चले जाने के बाद पार्वती जी ने भगवान विष्णु का स्मरण किया तब भगवान विष्णु ने वहां उपस्थित होकर पार्वती जी को आश्वासन दिया भगवान विष्णु ने सोचा कि जालंधर ने स्वयं अपनी मृत्यु का रास्ता बता दिया है यह दुष्ट वृंदा के पतिव्रत धर्म के कारण ही मृत्यु को प्राप्त नहीं होता अतः देवताओं के कार्य और भक्तों की रक्षा के लिए हमको ही वृंदा के धर्म को भंग करने का कठिन कार्य करना पड़ेगा ऐसा करने पर इस दुष्ट की मृत्यु होगी इतना ही देर में शिवजी भी वहां राक्षसी माया से मुक्त होकर जालंधर को आया देखकर उसके साथ युद्ध करने को तत्पर हुए और अनेक प्रकार से बाणो से उस पर प्रहार किया
कार्तिक मास के आठवें अध्याय में नारद जी ने कार्तिक व्रत के उद्यापन का वर्णन किया है जो की समस्त पापों को नष्ट करता है जो भी मनुष्य व्रत का पालन करते हैं कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को व्रत की पूर्ति और भगवान विष्णु के प्रति उद्यापन करें तुलसी के ऊपर एक सुंदर मंडप बनाना है उसे केले के खम्बो से संयुक्त करके विभिन्न प्रकार के धातुओं से उसकी विचित्र शोभा बढ़ानी है
मंडप के चारों ओर दीपकों की एक सुंदर श्रेणी में सजाकर उन्हें रखना है और उसे मंडप में सुंदर बंधनवार से सजा करके चार दरवाजे बनाएं और उन्हें फूलों से सुसज्जित करना है सवारों पर भिन्न-भिन्न प्रकार की मिट्टी के द्वारपाल बनाकर के उनकी पूजा करें उनके नाम जय विजय चंद्र प्रचंड नंद सूंड कुमुद kumudaksh उन्हें चारों दरवाजा पर दो-दो की पंक्ति के क्रम में स्थापित करके भक्ति पूर्वक उनकी पूजा उपासना करें
साथ ही साथ तुलसी की जड़ के कलश की स्थापना करें कलश के ऊपर शंख ,चक्र, भगवान विष्णु का पूजन करें, भक्ति पूर्वक उसे उपवास करना चाहिए और रात्रि में भजन कीर्तन करना चाहिए जो भगवान विष्णु के लिए जागरण करते समय भक्ति पूर्वक भजनों का दान करते हैं वह सैकड़ो जन्मों के पाप राशि से मुक्त हो जाते हैं जो भगवान विष्णु के लिए रात भर जागरण करते भजन कीर्तन करते हैं उनको असंखय गोदान का फल प्राप्त होता है जो भगवान की मूर्ति के समक्ष नृत्य- गान आयोजित करते हैं उनके अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं जो भगवान के सम्मुख बैठकर कीर्तन करते हैं और बंसी बजाकर भक्तों को प्रसन्न करते हैं एक खुशहाल वातावरण बनाते हैं भक्ति से रात्रि भर जागरण करते हैं उन्हें करोड़ों तीर्थ का फल प्राप्त होता है
इसके बाद पूर्णमासी में ब्राह्मण को आमंत्रित करना चाहिए प्रातः काल स्नान देव पूजा आदि करके वेद पर अग्नि की स्थापना करके भगवान की प्रीति के लिए तिल और खीर की आहुति देनी चाहिए हवन की शेष विधि पूरी करके भक्ति पूर्ण ब्राह्मणों का पूजन करें और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करें क्षमा अर्चना करें और श्रद्धा अपनी शक्ति अनुसार दक्षिणा दें
भगवान से प्रार्थना करते हुए बोले कि इस व्रत को करने से सात जन्मों के किए हुए पाप नष्ट हो जाए और संतान चिरंजीवी हो इस पूजा के दौरान मेरी समस्त इच्छाएं पूर्ण हो और मृत्यु के पश्चात विष्णु लोक की प्राप्ति हो पूजा के पश्चात अपने घर वालों और मित्रों के साथ स्वयं भोजन करें
भगवान द्वादशी तिथि को निद्रा से उठे त्रयोदशी को देवताओं आदि से मिले और चतुर्दशी को सबसे उनका दर्शन एवं पूजन किया इसीलिए उसे स्थिति में भगवान की पूजा अर्चना करनी चाहिए गुरु की आज्ञा लेते हुए भगवान विष्णु की प्रतिमा का पूजन करें विधि विधान से पूजा का पालन करें जो विधि विधान से पूजा का पालन करते हैं उन्हें उत्तम फलों की प्राप्ति होती है जो श्रद्धापूर्वक कार्तिक के उद्यापन का महत्व सुनता और सुनता है उन्हें विष्णु भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है
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