MOHINI EKADASHI VRAT KATHA 2025

साल 2025 में मोहिनी एकादशी 8 मई, गुरुवार को है. हिंदू पंचांग के मुताबिक, वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की 11वीं तिथि को मोहिनी एकादशी होती है. यह आम तौर पर अप्रैल-मई के महीने में आती है. 

मोहिनी एकादशी का व्रत पारण 9 मई, सुबह 5:34 बजे से 8:15 बजे तक किया जाएगा. 

मोहिनी एकादशी के दिन दान-पुण्य करने और जरूरतमंदों की सेवा करने का विधान है. 

MOHINI EKADASHI NIYAM

मोहिनी एकादशी व्रत से जुड़े कुछ नियम ये रहे: 

सुबह स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए. 

इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनने चाहिए. 

भगवान विष्णु को चंदन का तिलक लगाना चाहिए. 

पूजा में तुलसी के पत्ते ज़रूर चढ़ाने चाहिए. 

एकादशी से पहले ही तुलसी के पत्ते तोड़कर रख लेने चाहिए. 

एकादशी के दिन तुलसी को स्पर्श नहीं करना चाहिए. 

एकादशी के दिन जुआ, सट्टा, शराब, मांस-मदिरा, क्रोध, लोभ, मिथ्या और अंहकार से बचना चाहिए. 

एकादशी के दिन घर आए किसी ज़रूरतमंद को दान-दक्षिणा देकर ही घर से विदा करना चाहिए. 

एकादशी के दिन व्रत रखने वाले जातकों को दशमी तिथि से ही सात्विक भोजन करना चाहिए. 

एकादशी के दिन गौ की सेवा करनी चाहिए और उन्हें हरा चारा खिलाना चाहिए. 

एकादशी के दिन नाखून और बाल नहीं कटवाने चाहिए. 

एकादशी के दिन तामसिक भोजन जैसे कि मांस, मदिरा, प्याज, लेहसुन आदि नहीं खाने चाहिए. 

MOHINI EKADASHI IMPORTANCE

उपवास: इस दिन भक्त कठोर उपवास रखते हैं।

प्रार्थना: भक्त भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण, जो भगवान विष्णु के दूसरे रूप हैं, की प्रार्थना करते हैं।

दान-पुण्य: भक्त गरीबों और ब्राह्मणों को भोजन कराने जैसे दान-पुण्य करते हैं।

तीर्थयात्रा: भक्त कृष्ण मंदिरों में जाते हैं।

आध्यात्मिक नवीनीकरण: मोहिनी एकादशी आध्यात्मिक नवीनीकरण और पापों की सफाई का दिन है।

MOHINI EKADASHI VRAT KATHA

युधिष्ठिर ने पूछा- जनार्दन! वैशाख मास के शुक्ल-पक्ष में किस नाम की EKADASHI होती है? उसका क्या फल होता है ? तथा उसके लिये कौन-सी विधि है?

भगवान् श्रीकृष्ण बोले- महाराज! पूर्वकाल में परम बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजीने महर्षि वसिष्‍ठ से यही बात पूछी थी, जिसे आज तुम मुझसे पूछ रहे हो।

श्रीराम ने कहा था – भगवन् ! जो समस्त पापों का क्षय तथा सब प्रकार के दुःखों का निवारण करने वाला व्रतों में उत्तम व्रत हो, उसे मैं सुनना चाहता हूं।

वसिष्ठ जी बोले– श्रीराम! तुमने बहुत उत्तम बात पूछी है। मनुष्य तुम्हारा नाम लेने से ही सब पापों से शुद्ध हो जाता है। तथापि लोगों के हितकी इच्छा से मैं पवित्रों में पवित्र उत्तम व्रत का वर्णन करूंगा। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी होती है, उसका नाम मोहिनी है। वह सब पापों को हरने वाली और उत्तम है। उसके व्रत के प्रभाव से मनुष्य मोहजाल तथा पातक- समूह से छुटकारा पा जाते हैं।

सरस्वती नदी के रमणीय तट पर भद्रावती नामकी सुंदर नगरी है। वहां द्युतिमान नामक राजा, जो चन्द्र वंश में उत्पन्न हुए थे, राज करते थे। उसी नगर में एक वैश्य रहता था, जो धनधान्य से परिपूर्ण और समृद्धिशाली था। उसका नाम था धनपाल। वह सदा पुण्यकर्म में ही लगा रहता था। दूसरों के लिए पौंसला, कुआं, मठ, बगीचा, पोखरा और घर बनवाया करता था। भगवान् श्रीविष्णु को भक्ति में उसका हार्दिक अनुराग था। वह सदा शान्त रहता था। उसके पांच पुत्र थे- सुमना, द्युतिमान्, मेधावी, सुकृत तथा धृष्टबुद्धि। धृष्टबुद्धि पांचवां था। वह सदा बड़े-बड़े पापों में ही लिप्‍त रहता था। जुए आदि दुर्व्यसनों में उसकी बड़ी आसक्ति थी। वह वेश्याओं से मिलने के लिए लालायित रहता था। उसकी बुद्धि न तो देवताओं के पूजन में लगती थी और न पितरों तथा ब्राह्मणों के सत्कार में। वह दुष्टात्मा अन्याय के मार्ग पर चलकर पिता का धन बर्बाद किया करता था।

एक दिन वह वेश्या के गले में बांह डाले चौराहे पर घूमता देखा गया। तब पिता ने उसे घर से निकाल दिया तथा बन्धु बान्धवों ने भी उसका परित्याग कर दिया। अब वह दिन-रात दुख और शोक में डूबा तथा कष्ट-पर-कष्ट उठाता हुआ इधर-उधर भटकने लगा। एक दिन किसी पुण्य के उदय होने से वह महर्षि कौण्डिन्य के आश्रम पर जा पहुंचा। वैशाख का महीना था। तपोधन कौण्डिन्य गंगाजी में स्‍नान करके आए थे। धृष्टबुद्धि शोक के भार से पीड़ित हो मुनिवर कौण्डिन्य के पास गया और हाथ जोड़ सामने खड़ा होकर बोला- ‘ब्राह्मण! द्विजश्रेष्ठ ! मुझपर दया करके कोई ऐसा व्रत बताइए, जिसके पुण्य के प्रभाव से मेरी मुक्ति हो।’

कौण्डिन्य बोले– वैशाख के शुक्ल पक्ष में मोहिनी नाम से प्रसिद्ध एकादशी का व्रत करो। मोहिनी को उपवास करने पर प्राणियों के अनेक जन्मों के किये हुए मेरुपर्वत- जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं। वसिष्ठजी कहते हैं- श्रीरामचन्द्र! मुनि का यह वचन सुनकर धृष्टबुद्धि का चित प्रसन्न हो गया। उसने कौण्डिन्‍य के उपदेश से विधिपूर्वक मोहिनी एकादशी का व्रत किया। नृपश्रेष्ठ! इस व्रत के करने से वह निष्पाप हो गया और दिव्य देह धारण कर गरुड़ पर आरूढ़ हो सब प्रकार के उपद्रवों से रहित श्रीविष्णुधाम को चला गया। इस प्रकार यह मोहिनी का व्रत बहुत उत्तम है। इसके पढ़ने और सुनने से सहस्त्र गोदान का फल मिलता है।

एकादशी माता की आरती (Ekadashi Mata Ki Aarti)


ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता।

विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता॥

ॐ जय एकादशी…॥

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी।

गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी॥

ॐ जय एकादशी…॥

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।

शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई॥

ॐ जय एकादशी…॥

पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है।

शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै॥

ॐ जय एकादशी…॥

नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।

शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै॥

ॐ जय एकादशी…॥

विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी।

पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की॥

ॐ जय एकादशी…॥

चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली।

नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली॥

ॐ जय एकादशी…॥

शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी।

नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी॥

ॐ जय एकादशी…॥

योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।

देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी॥

ॐ जय एकादशी…॥

कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।

श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए॥

ॐ जय एकादशी…॥

अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।

इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला॥

ॐ जय एकादशी…॥

पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।

रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी॥

ॐ जय एकादशी…॥

देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।

पावन मास में करूं विनती पार करो नैया॥

ॐ जय एकादशी…॥

परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।

शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी॥

ॐ जय एकादशी…॥

जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।

जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै॥

ॐ जय एकादशी…॥

EKADASHI KI AARTI

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।

भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥

जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।

सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।

तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥

पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥

तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।

मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।

किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।

अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।

श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥

तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।

तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥

जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।

कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥

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