Putrada Ekadashi 5TH AUGUST 2025 TIME / DATE / KATHA / SIGNIFICANCE / RITUALS / AARTI

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Putrada Ekadashi 5TH AUGUST 2025 TIME / DATE / KATHA / SIGNIFICANCE / RITUALS / AARTI

Putrada Ekadashi, पर अवलोकन किया गया श्रावण माह में शुक्ल पक्ष (चंद्रमा की बढ़ती अवस्था) का 11वाँ दिन (एकादशी), हिंदू परंपरा में गहरा महत्व रखता है। 2025 में श्रावण पुत्रदा एकादशी है मंगलवार, 5 अगस्त. यह शुभ दिन समर्पित है भगवान विष्णु और संतान के लिए आशीर्वाद चाहने वाले जोड़ों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

श्रावण पुत्रदा एकादशी 2025 की तिथि और समय

  • एकादशी तिथि आरंभ: 4 अगस्त 2025, सुबह 11:41 बजे
  • एकादशी तिथि समाप्त: 5 अगस्त 2025, दोपहर 1:12 बजे
  • पारण (उपवास तोड़ने) का समय: 6 अगस्त 2025, सुबह 5:44 बजे से सुबह 8:24 बजे तक

Significance of Putrada Ekadashi

“पुत्रदा” शब्द का अनुवाद “पुत्रों का दाता” है। इस एकादशी का पालन करने की मान्यता है:

  • जोड़ों को संतान का आशीर्वाद दें: यह विशेष रूप से संतान की इच्छा रखने वाले जोड़ों द्वारा मनाया जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि यह माता-पिता बनने का वरदान देता है।
  • आत्मा को शुद्ध करें: ऐसा माना जाता है कि इस दिन उपवास और प्रार्थना करने से पिछले पापों से मुक्ति मिलती है, जिससे आध्यात्मिक उत्थान होता है।
  • परिवार कल्याण सुनिश्चित करें: भक्त अपने परिवार की समग्र भलाई और समृद्धि के लिए आशीर्वाद मांगते हैं।

कहा जाता है कि पुत्रदा एकादशी का श्रद्धापूर्वक पालन करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और दैवीय कृपा आती है। 

पुत्रदा एकादशी व्रत कथा (पौराणिक कथा)

द्वापर युग के आरंभ में महिष्मति नामक की एक नगरी थी, जिसमें महीजित नाम का राजा राज्य किया करता था, लेकिन पुत्रहीन होने के कारण राजा को राज्य सुखदायक नहीं लगता था। उसका मानना यह था, कि जिसके संतान नही  हो, उसके लिए यह लोक और परलोक दोनों ही अति दु:खदायक होते हैं।

पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए परंतु फिर भी राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई।

वृद्धावस्था आती देखकर राजा ने प्रजा के प्रतिनिधियों को बुलाया और कहा- हे प्रजाजनों! मेरे खजाने में अन्याय से अर्जित  किया हुआ धन नहीं है। न मैंने कभी देवताओं तथा ब्राह्मणों का धन छीना न ही  किसी दूसरे की धरोहर भी मैंने लिएा है , प्रजा को पुत्र के समान पालता रहा हूँ । मैं अपराधियों को पुत्र तथा बाँधवों की तरह दंड देता रहा। कभी किसी से घृणा  तक नहीं की। सबको सामान माना है। सज्जनों की सदा पूजा अर्चना  करता हूँ। इस प्रकार धर्मयुक्त राज्य करते हुए भी मेरे पु‍त्र नहीं है। इसी बात से मैं अत्यंत दु:ख पा रहा हूँ, इसका क्या कारण है? में जानना चाहता हूँ 

राजा महीजित की इस बात को विचारने के लिए मं‍त्री तथा प्रजा के प्रतिनिधि वन को गए। वहाँ बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों के दर्शन किए। राजा की उत्तम कामना की पूर्ति के लिए किसी श्रेष्ठ तपस्वी मुनि की खोज करते रहे।

एक आश्रम में उन्होंने एक अत्यंत अति वृद्ध धर्मज्ञानी , महान  तपस्वी, परमात्मा में अपना मन लगाए हुए निराहार, जितेंद्रीय, जितात्मा, सनातन धर्म के गूढ़ तत्वों को ज्ञान रखने  वाले, समस्त शास्त्रों के महान ज्ञाता  लोमश मुनि को देखा, जिनका कल्प के व्यतीत होने पर एक रोम गिरता था।

सबने जाकर ऋषि को नतमस्तक होकर प्रणाम किया। उन लोगों को देखकर मुनि ने पूछा कि आप लोग किस कारण से आए हैं? नि:संदेह मैं आप लोगों का हित करूँगा। मेरा जन्म केवल दूसरों के उपकार के लिए हुआ है, इसमें संदेह कदापि मत करो।

लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर सब लोग बोले: हे महर्षे! आप हमारी बात जानने में ब्रह्मा से भी अधिक समर्थ हैं। अत: आप हमारे इस कष्ट  को दूर कीजिए। महिष्मति पुरी का धर्मात्मा राजा महीजित प्रजा का पुत्र के समान पालन करता है। फिर भी वह पुत्रहीन होने के कारण दु:खी है।

उन लोगों ने आगे कहा कि हम लोग उसकी प्रजा हैं। अत: उसके दु:ख से हम भी दु:खी हैं। आपके दर्शन से हमें पूर्णतया  विश्वास है कि हमारा यह संकट अवश्य दूर हो जाएगा क्योंकि महान पुरुषों के दर्शन मात्र से अनेक कष्ट दूर हो जाते हैं। अब आप कृपा करके राजा के पुत्र होने का उपाय बतलाएँ।

यह वचन  सुनकर ऋषि ने थोड़ी देर के लिए नेत्र बंद किए और राजा के पूर्व जन्म का वृत्तांत जानकर कहने लगे कि यह राजा पूर्व जन्म में एक निर्धन वैश्य था। निर्धन होने के कारण इसने कई बुरे कर्म किए। यह एक गाँव से दूसरे गाँव व्यापार करने जाया करता था।

एक समय ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन मध्याह्न के समय वह जबकि वह दो दिन से भूखा-प्यासा था, एक जलाशय पर जल पीने गया। उसी स्थान पर एक तत्काल की ब्याही हुई प्यासी गौ जल पी रही थी।

राजा ने उस प्यासी गाय को जल पीते हुए हटा दिया और स्वयं जल पीने लगा, इसीलिए राजा को यह दु:ख सहना पड़ा। एकादशी के दिन भूखा रहने से वह राजा हुआ और प्यासी गौ को जल पीते हुए हटाने के कारण पुत्र वियोग का दु:ख सहना पड़ रहा है। ऐसा सुनकर सब लोग कहने लगे कि हे ऋषि! शास्त्रों में पापों का प्रायश्चित भी लिखा है। अत: जिस प्रकार राजा का यह पाप नष्ट हो जाए, आप ऐसा उपाय बताइए।

लोमश मुनि कहने लगे कि श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी को जिसे पुत्रदा एकादशी भी कहते हैं, तुम सब लोग व्रत करो और रात्रि को जागरण करो तो इससे राजा का यह पूर्व जन्म का पाप अवश्य नष्ट हो जाएगा, साथ ही राजा को पुत्र की अवश्य प्राप्ति होगी।

लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर मंत्रियों सहित सारी प्रजा नगर को वापस लौट आई और जब श्रावण शुक्ल एकादशी आई तो ऋषि की आज्ञानुसार सबने पुत्रदा एकादशी का व्रत और जागरण किया।

इसके पश्चात द्वादशी के दिन इसके पुण्य का फल राजा को दिया गया। उस पुण्य के प्रभाव से रानी ने गर्भ धारण किया और प्रसवकाल समाप्त होने पर उसके एक बड़ा तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ।

इसलिए हे राजन! इस श्रावण शुक्ल एकादशी का नाम पुत्रदा पड़ा। अत: संतान सुख की इच्छा हासिल करने वाले इस व्रत को अवश्य करें। इसके माहात्म्य को सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है और इस लोक में संतान सुख भोगकर परलोक में स्वर्ग को प्राप्त होता है। ॥ जय श्री हरि ॥

पुत्रदा एकादशी के अनुष्ठान और व्रत

पुत्रदा एकादशी का पालन करने में मन, शरीर और आत्मा को शुद्ध करने के उद्देश्य से अनुष्ठानों और प्रथाओं की एक श्रृंखला शामिल होती है:

दशमी (दसवां दिन) की तैयारी

  • Sattvic Diet: एकादशी से एक दिन पहले, भक्त उपवास के लिए शरीर को तैयार करने के लिए अनाज, बीन्स, प्याज, लहसुन और कुछ मसालों से परहेज करते हुए, सूर्यास्त से पहले साधारण शाकाहारी भोजन का सेवन करते हैं।
  • Sankalpa (Vow): भक्त दैवीय आशीर्वाद पाने के लिए ईमानदारी और भक्ति के साथ व्रत रखने का संकल्प लेते हैं।

Fasting on Ekadashi

उपवास एकादशी पालन का केंद्र है और इसे विभिन्न रूपों में किया जा सकता है:

  • Nirjala Fast: 24 घंटे तक भोजन और पानी से पूर्ण परहेज। इस रूप को अत्यधिक कठोर माना जाता है और अच्छे स्वास्थ्य वाले लोग इसे अपनाते हैं।
  • Phalahar Fast: फल, दूध और पानी के सेवन की अनुमति है। यह भक्तों के बीच एक आम प्रथा है।
  • Sattvic Diet: कुछ लोग फलों, सब्जियों और डेयरी उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करते हुए अनाज और फलियों से रहित हल्का भोजन खा सकते हैं।

उपवास विधि का चुनाव व्यक्तिगत स्वास्थ्य और आराम पर निर्भर करता है, लेकिन अंतर्निहित सिद्धांत आत्म-संयम का अभ्यास करना और आध्यात्मिक विकास पर ध्यान केंद्रित करना है।

सुबह की रस्में

  1. ब्रह्म मुहूर्त जागरण: भक्त जल्दी उठते हैं, अधिमानतः ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग 1.5 घंटे पहले) के दौरान, जिसे आध्यात्मिक प्रथाओं के लिए एक शुभ समय माना जाता है।
  2. शुद्धिकरण स्नान: एक अनुष्ठानिक स्नान किया जाता है, जिसमें कभी-कभी शुद्धिकरण के प्रतीक के रूप में गंगा जल की कुछ बूँदें मिलाई जाती हैं।
  3. वेदी की तैयारी: भगवान विष्णु की मूर्ति या छवि के साथ एक वेदी तैयार की जाती है, जिसे फूलों, धूप और जलते हुए घी के दीपक से सजाया जाता है।
  4. पूजा (पूजा): भक्त विस्तृत पूजा करते हैं, भगवान विष्णु को उनके नाम और मंत्रों का जाप करते हुए तुलसी के पत्ते, फल और मिठाइयाँ चढ़ाते हैं।

दिन के समय अभ्यास

  • धर्मग्रंथ पढ़ना: जैसे पवित्र ग्रंथ पढ़ना विष्णुसहस्रनाम (विष्णु के हजार नाम) या Bhagavad Gita आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति को बढ़ाता है।
  • मंत्र जाप: “ओम नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का निरंतर जाप परमात्मा के साथ गहरा संबंध स्थापित करता है।
  • दान: धर्मार्थ गतिविधियों में संलग्न होना, जैसे गरीबों को खाना खिलाना या जरूरतमंदों को दान देना

EKADASHI KI AARTI

एकादशी माता की आरती (Ekadashi Mata Ki Aarti)

ॐ जय एकदशी, जय एकदशी, जय एकदशी माता।

विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता॥

ॐ जय एकादशी…॥

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी।

गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी॥

ॐ जय एकादशी…॥

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष में विश्वतरणी का जन्म हुआ था।

शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई॥

ॐ जय एकादशी…॥

पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है।

शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै॥

ॐ जय एकादशी…॥

नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।

शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै॥

ॐ जय एकादशी…॥

विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ल आमलकी।

पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की॥

ॐ जय एकादशी…॥

चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली।

नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली॥

ॐ जय एकादशी…॥

शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी।

नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी॥

ॐ जय एकादशी…॥

योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।

देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी॥

ॐ जय एकादशी…॥

कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।

श्रावण श्वेत हो और पवित्र आनंद में रहे।

ॐ जय एकादशी…॥

अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ल।

इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला॥

ॐ जय एकादशी…॥

पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।

रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी॥

ॐ जय एकादशी…॥

देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।

पावन मास में करूं विनती पार करो नैया॥

ॐ जय एकादशी…॥

परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।

शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी॥

ॐ जय एकादशी…॥

जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।

जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै॥

ॐ जय एकादशी…॥

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EKADASHI KI AARTI

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।

भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥

जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।

सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।

तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥

परब्रह्म, सर्वोच्च भगवान, आप सभी के भगवान हैं। ॐ जय…॥

तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।

मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।

किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।

अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।

श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥

तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।

तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥

जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।

कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥

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