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ToggleSAPHALA EKADASHI DATE, TIME, KATHA RITUALS AND REMEDIES
हिंदू माह पौष (दिसंबर-जनवरी) में कृष्ण पक्ष (चंद्रमा के घटते चरण) के दौरान मनाया जाने वाला सफला एकादशी, भगवान विष्णु को समर्पित एक महत्वपूर्ण दिन है। “सफला” शब्द का अनुवाद “सफलता” है और ऐसा माना जाता है कि इस एकादशी का पालन करने से समृद्धि और आध्यात्मिक उत्थान होता है।
2025 के लिए तिथि और समय
2025 में सफला एकादशी 15 दिसंबर, सोमवार को है। प्रमुख समय इस प्रकार हैं:
एकादशी तिथि आरंभ: 14 दिसंबर 2025, शाम 6:49 बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 15 दिसंबर 2025, रात 9:19 बजे
पारण (उपवास तोड़ना): 16 दिसंबर 2025, सुबह 7:07 बजे से 9:11 बजे के बीच
Significance of Saphala Ekadashi
सफला एकादशी सफलता, समृद्धि और आध्यात्मिक विकास चाहने वाले भक्तों के लिए अत्यधिक महत्व रखती है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत को करने से व्यक्ति के पाप धुल जाते हैं और उसे परम मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह भी माना जाता है कि यह किसी के परिवार में शांति और खुशी लाता है।
व्रत कथा (सफला एकादशी से जुड़ी पौराणिक कथा)
प्राचीनकाल में चम्पावती नगरी में महिष्मान नामक राजा राज किया करता था। भगवान श्री हरी की कृपा से उसे चार पुत्र थे। किन्तु उन सभी पुत्रो में लुम्पक नाम का सबसे ज्येष्ठ पुत्र महापापी और दुराचारी था। वह अधर्म के मार्ग पर चलते हुए परस्त्री गमन, जुआ, मदिरापान, वैश्यागमन जैसे कुकर्मो में अपने पिता का पुण्य से अर्जित किआ हुआ धन नष्ट कर रहा था।
वह सदैव ब्राह्मण, देवता, वैष्णव, ऋषि, संतो की निंदा करता रहता था। उसे किस भी धर्म काज में रूचि नहीं थी। एक समय जब उसके परम धर्मात्मा पिता को उसके कुकर्मो के विषय में ज्ञात हुआ तो उन्होंने उसी क्षण उसे अपने नगर से बाहर निकाल दिया। नगर से दूर होते ही लुम्पक की बुद्धि ने उसका साथ देना छोड़ दिया। उसे अब कुछ भी नहीं सूझ रहा था की इस अवस्था में वह क्या करें और क्या ना करें।
भूख से परेशान हो कर वो वन्य जीवो को मार कर खाने लगा। और धन की लालसा में रात्रि को अपने ही नगर में जा कर चोरी करता और निर्दोष नगर जनो को परेशान कर उन्हें मारने का महापाप करने लगा। कुछ समय पश्चात सारी नगरी उससे भयभीत होने लगी। निर्दोष वन्य जीवो को मार कर उसकी बुद्धि कुपित हो गई थी। कई बार राजसी सेवको और नगर जनों ने उसे पकड़ा किन्तु राजा के भय से वह उसे छोड़ देते।
वन के मध्य में एक अतिप्राचीन और विशाल पीपल का वृक्ष था। वह इतना प्राचीन था की कई नगर जन उसे भगवान की ही तरह पूजा करते थे। वंही लुम्पक को इस विशाल वृक्ष की छाया अति आनंद प्रदान करती थी इसी कारणवश वह भी इसी वृक्ष की छाया में जीवन व्यतीत करने लगा। इस वन को लोग देवताओं की क्रीड़ास्थली भी मानते थे। कुछ समय बीतने पर आनेवाली पोष माह के कृष्णपक्ष की दसवीं तिथि की रात्रि को लुम्पक वस्त्रहीन होने के कारण शीत ऋतु के चलते वो पूरी रात्रि सो ना सका। उसके शरीर के अंग जकड गये थे।
सूर्योदय होते होते वह मूर्छित हो गया। अगले दिन एकादशी को मध्याह्न के समय सूर्य की गरमी से उसकी मूर्छा दूर हुई। रात्रि जागरण और कई दिन से आहार ना करने की वजह से वो बहुत अशक्त हो गया था। गिरता संभालता आज वह फिर भोजन की खोज में वन को निकल पड़ा। अशक्त होने के कारण वह आज इस अवस्था में नहीं था की किसी पशु का आँखेद कर सके इस लिए वृक्ष के निचे गिरे हुए फलो को एकत्रित करते हुए वह पुनः वही विशाल पीपल के वृक्ष के नीचे आ बैठा तब तक सूर्यास्त होने को था। एकदशी के महापर्व पर आज उससे अनजाने में व्रत हो चुका था। अत्यंत दुःख के कारण वह अपने आप को प्रभु श्री हरी को समर्पित करते हुए कहने लगा –
“हे प्रभु..!! अब आपके ही है यह फल। आपको ही समर्पित करता हुँ। आप भी तृप्त हो जाइये।”
उस दिन भी अत्यंत दुःख के चलते वो पूरी रात्रि सो नहीं पाया। उसके इस व्रत (उपवास) से भगवान अत्यंत प्रसन्न हुए। प्रातः होने पर एक अत्यंत सुन्दर अश्व, सुन्दर परिधानो से सुसज्ज, उसके सामने आके खड़ा हो गया। उसी क्षण एक आकाशवाणी हुई –
“हे राजपुत्र, श्री नारायण की कृपा से तुम्हारे सर्व पापो का नाश हो चुका है। अब तुम अपने राज्य अपने पिता के पास लौट कर उनसे राज्य ग्रहण करोI”
आकाशवाणी से सुन प्रसन्न चित हो कर सुन्दर परिधान धारण कर भगवान श्री हरी का जय करा लगते हुए वह अपने राज्य को प्रस्थान कर गया। वंहा राज्य में राजा को भी इस बात की पुष्टि हो गई थी। अपने पापी पुत्र के पाप नष्ट होने पर राजा ने भी उसे सहर्ष स्वीकाराते हुए अपना राजपाठ उसे सौप दिया और खुद वन की और चले गये।
अब लुम्पक भी शास्त्रनुसार राजपाठ चलाने लगा था और उसका सारा परिवार पुत्र, स्त्री सहित भगवान श्री हरी के परम भक्त बन चुके थे। वृद्धावस्था आने पर वह भी अपने सुयोग्य पुत्र को अपने राज्य का कारभार सौपते हुए वन की ओर तपस्या करने चला गया और अपने अंत समय में वैकुंठ को प्राप्त हुआ।
अतः हे धर्मराज, जो भी मनुष्य अपने जीवनकाल में इस एकादशी(Saphala Ekadashi) का व्रत करता है उसे अपने अंत समय भी निसंदेह मुक्ति की प्राप्ति होती है। जो मनुष्य इस पतित पावनी एकादशी का व्रत नहीं करता है वो सींग और पूँछ रहित पशु के समान है। इस सफला एकादशी(Saphala Ekadashi) की कथा का जो भी मनुष्य श्रवण या पठन करता है उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
अनुष्ठान
दिव्य आशीर्वाद पाने के लिए भक्त विभिन्न अनुष्ठानों के साथ सफला एकादशी का पालन करते हैं:
- उपवास: भक्त अनाज, फलियाँ और कुछ सब्जियों से परहेज करते हुए उपवास करते हैं। कुछ लोग निर्जला व्रत रखते हैं, भोजन और पानी दोनों से परहेज करते हैं, जबकि अन्य फल और दूध का सेवन कर सकते हैं।
- पूजा (पूजा): भक्त जल्दी उठते हैं, स्नान करते हैं और तुलसी के पत्तों, फूलों, धूप और दीपों के साथ भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। इस दिन भगवत गीता का पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है।
- मौन (मौन): कुछ अभ्यासकर्ता आंतरिक चिंतन और आध्यात्मिक विकास पर ध्यान केंद्रित करते हुए पूरे दिन मौन (मौन) का पालन करते हैं।
- रात्रि जागरण: पूरी रात जागना, भजन गाना और भगवान के नाम का जाप करना भक्ति व्यक्त करने और आशीर्वाद पाने की सामान्य प्रथा है।
उपाय एवं लाभ
माना जाता है कि सफला एकादशी का पालन करने से कई आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं:
पैतृक मुक्ति: निर्धारित अनुष्ठान करने से किसी के पूर्वजों को नकारात्मक क्षेत्रों से मुक्ति मिल सकती है, जिससे उन्हें शांति और दिव्य निवास में स्थान मिलता है।
आध्यात्मिक विकास: उपवास और भक्ति गतिविधियों में संलग्न होने से मन और शरीर शुद्ध होते हैं, आध्यात्मिक उन्नति और आंतरिक शांति को बढ़ावा मिलता है।
मोक्ष की प्राप्ति: भक्तों का मानना है कि इस एकादशी का ईमानदारी से पालन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, जिससे आत्मा जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाती है।
निष्कर्ष
सफला एकादशी गहन आध्यात्मिक महत्व का दिन है, जो भक्तों को अपनी आत्मा को शुद्ध करने, पिछले दुष्कर्मों के लिए क्षमा मांगने और अपने पूर्वजों की भलाई सुनिश्चित करने का अवसर प्रदान करता है। समर्पित पालन के माध्यम से, व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकता है और मुक्ति के अंतिम लक्ष्य के करीब पहुंच सकता है।
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