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Navratri 2024 Saptashi Pratham Adhyaya Ma Shailputri Ka Path /नवरात्री 2024 के पहले दिन श्री दुर्गा सप्तशी के प्रथम अध्याय माँ शैलपुत्री का पाठ
NAVTRATRI 2024 हिंदू-धर्म सर्वमान्य ग्रन्थ है। इसमें भगवती की कृपाके सुन्दर इतिहास के साथ ही बड़े-बड़े गूढ़ रहस्य भरे पडे हैं। कर्म, भक्ति और ज्ञानकी त्रिविध मन्दाकिनी बहाने वाला यह ग्रन्थ भक्तों के लिये कामना कल्पवृक्ष के समान है। NAVRATRI 2024 श्री दुर्गा सप्तशी के उपासना से फल देने वाला दुर्लभ वस्तु अथवा स्थिति सहज ही प्राप्त की जा सकती है जिसमे निष्काम भक्त परम फल स्वरुप मोक्ष को पाकर संतुष्ट होते हैं।
NAVRATRI 2024 नवरात्रि में इसका पाठ करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है साथ ही इसके पाठ जल्दी फलदाई माने गए हैंनवरात्र के दिनों में मां दुर्गा सप्तशती के पाठ करने से अन्य धान्य यश कीर्ति आदि की प्राप्ति होती है
NAVRATRI 2024 श्री दुर्गासप्तशती पाठ पुराण मार्कण्डये में 81वें अध्याय से 94वें अध्याय तक विस्तारपूर्वक वर्णन दिया गया है। श्री दुर्गासप्तशती में 13 अध्याय 700 श्लोक से माँ दुर्गा वर्णन किया गया है। NAVRATRI 2024 इस सप्तशती पाठ में 13 अध्याय जिन्हे तीन चरित्र भी कहते है। सप्तशती’ का अर्थ सात सौ छंदों का समूह होता है। श्री दुर्गासप्तशती का नवरात्रि के दिनों में पाठ किया जाता है।
NAVRATRI 2024 नवरात्रि के दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की विधि विधान से पूजा करने का नियम है इसी के साथ दुर्गा सप्तशती के पाठ का भी पठन किया जाता है जिसमें कुल 13 अध्याय हैं और उसमें मां दुर्गा की महिमा बताई गई हैइसका पाठ करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है लेकिन जब नवरात्रि में इसका पाठ किया जाता है तो कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना अत्यधिक आवश्यक है
NAVRATRI 2024 दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से पहले गणेश जी का विधि विधान पूर्वक अवश्य कर लेना चाहिए अगर घर में कलश की स्थापना की गई है तो उसका पूजन भी निश्चित रूप से विधि विधान के साथ करना चाहिए
NAVRATRI 2024 दुर्गा सप्तशती की पुस्तक को शुद्ध आसन पर लाल कपड़े के ऊपर रखना चाहिए और कथा को कुमकुम चावल रोली से पूजन करके ही पूर्व दिशा की ओर मुख कर बैठ करके आचमन करके पाठ का प्रारंभ करना चाहिए
NAVRATRI 2024 पाठ करने के पश्चात मन से किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिए क्षमा याचना अवश्य करना चाहिए
NAVRATRI 2024 SAPTASHI PATH के पाठ में कवच अर्गला कीलक स्रोत के पाठ करने से पहले शापोद्वार करना जरूरी माना गया है क्योंकि दुर्गा सप्तशती का हर मंत्र ब्रह्मा,वशिष्ठ,विश्वामित्र जी द्वारा स्थापित किया गया है शापोद्वार द्वारा किए बिना इसका उचित फल प्राप्त नहीं होता है
NAVRATRI 2024 पहला अध्याय – मधु और कैटभ का वध की व्याख्या
श्री दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय में राजा स्वयं को बलहीन देखकर उसके दुष्ट मंत्रियों द्वारा राजा की सेना और खजाने पर कब्ज़ा करने का उल्लेख किया गया है राजा अपने नगर की ममता के आकर्षण से अपने मन में सोचने लगता है कि पूर्वकाल में पूर्वजों ने जिस नगर का पालन किया था वह आज मेरे हाथ से निकल गया
NAVRATRI 2024 श्री दुर्गा सप्तशती -पहला अध्याय
महर्षि ऋषि का राजा सुरथ और समाधि को देवी की महिमा बताना यदि साधक को किसी भी प्रकार की चिंता है, किसी भी प्रकार का मानसिक विकार अर्थात मानसिक कष्ट है तो दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय के पाठ से इन सभी मानसिक विचारों और दुष्चिंताओं से मुक्ति मिलती है। मनुष्य की चेतना जागृत होती है और विचारों को सही दिशा मिलती है।किसी भी प्रकार के नकारात्मक विचार आप पर हावी नहीं होते हैं। इस प्रकार दुर्गा सप्तशती के NAVRATRI 2024 पहले अध्याय से आपको हर प्रकार की मानसिक चिंताओं से मुक्ति मिलती है।
॥ध्यानम्॥
म ॐ खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्। नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥१॥
ओम नमशचंडिकायै
अर्थ :
NAVRATRI 2024 भगवान् विष्णुके सो जानेपर, मधु और कैटभ को मारनेके लिये, कमलजन्मा ब्रह्माजी ने, जिनका स्तवन किया था, उन महाकाली देवी का मैं ध्यान करता हूँ। वे अपने दस हाथों में, खड़ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि, मस्तक और शङ्ख धारण करती हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वे समस्त अंगो मे दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं। उनके शरीरकी कान्ति, नीलमणिके समान है तथा वे दस मुख और दस पैरोंसे युक्त हैं।
NAVRATRI 2024 ॐ माँ चण्डीदेवी को नमस्कार है।
“ॐ ऐं” मार्कण्डेय उवाच॥१॥ श्री दुर्गा सप्तशती -पहला अध्याय !
NAVRATRI 2024 मार्कण्डेय जी बोले – सूर्य के पुत्र साविर्णि, जो आठवें मनु कहे जाते हैं, उनकी उत्पत्ति की कथा विस्तार पूर्वक कहता हूँ, सुनो। सूर्यकुमार महाभाग सवर्णि, भगवती महामाया के अनुग्रह से जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी हुए, वही प्रसंग सुनाता हूँ।
NAVRATRI 2024 पूर्वकाल की बात है, सुरथ नाम के एक राजा थे, जो चैत्र वंश में उत्पन्न हुए थे। उनका समस्त भूमण्डल पर अधिकार था । वे प्रजा का अपने पुत्रों की भाँति धर्मपूर्वक पालन करते थे। फिर भी उस समय कोलाविध्वंसी नाम के क्षत्रिय, उनके शत्रु हो गये।
राजा सुरथ की दण्डनीति बड़ी प्रबल थी। उनका शत्रुओं के साथ संग्राम हुआ। यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्या में कम थे, तो भी राजा सुरथ, युद्ध में उनसे परास्त हो गये। तब वे युद्ध भूमि से अपने नगर को लौट आये, और केवल अपने देश के राजा होकर रहने लगे। समूची पृथ्वी से अब उनका अधिकार जाता रहा। किंतु वहाँ भी उन प्रबल शत्रुओं ने महाभाग राजा सुरथ पर आक्रमण कर दिया।
NAVRATRI 2024 राजा का बल क्षीण हो चला था, इसलिये उनके दुष्ट, बलवान एवं दुरात्मा मंत्रियों ने, वहाँ उनकी राजधानी में भी, राजकीय सेना और खजाने को वहाँ से हथिया लिया। सुरथ का प्रभुत्व नष्ट हो चुका था। इसलिये वे शिकार खेलने के बहाने, घोड़े पर सवार हो, वहाँ से अकेले ही एक घने जंगल में चले गये।
वहाँ उन्होंने मेधा मुनि का आश्रम देखा। जहाँ कितने ही हिंसक जीव, अपनी स्वाभाविक हिंसावृत्ति छोड़कर परम शान्त भाव से रह रहे थे। मुनि के बहुत से शिष्य उस वन की शोभा बढ़ा रहे थे। वहां जाने पर मुनि ने उनका सत्कार किया। उन मुनिश्रेष्ठ के आश्रम में राजा सुरथ इधर-उधर विचरते हुए कुछ काल तक वहां रहे।
फिर ममता से आकृष्टचित्त होकर उस आश्रम में इस प्रकार चिंता करने लगे – पूर्वकाल में मेरे पूर्वजों ने जिसका पालन किया था, वहीं नगर आज मुझसे रहित है। पता नहीं मेरे दुराचारी मंत्रीगण उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मद की वर्षा करने वाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओं के अधीन होकर न जाने किन भोगों को भोगता होगा?
जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पाने से सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओं का अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगों के द्वारा सदा खर्च होते रहने के कारण अत्यन्त कष्ट से जमा किया हुआ मेरा वह खजाना खाली हो जायगा ।’ ये तथा और भी कई बातें राजा सुरथ निरन्तर सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने वहाँ विप्र वर मेधा के आश्रम के निकट एक वैश्य को देखा और उससे पूछा – ‘भाई तुम कौन हो ? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है ? तुम क्यों शोक ग्रस्त और अनमने-से दिखायी देते हो ?’ राजा सुरथ का यह प्रेमपूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्य ने विनीत भाव से उन्हें प्रणाम करके कहा –
NAVRATRI 2024 वैश्य बोला – राजन्! मैं धनियों के कुल में उत्पन्न एक वैश्य हूँ। मेरा नाम समाधि है। मेरे दुष्ट स्त्री और पुत्रों ने धन के लोभ से मुझे घर से बाहर निकाल दिया है। मैं इस समय धन, स्त्री और पुत्र से वंचित हूँ। मेरे विश्वसनीय बंधुओं ने मेरा ही धन लेकर मुझे दूर कर दिया है। वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः। इसलिये दुखी होकर मैं वन में चला आया हँ। यहाँ रहकर मैं इस बात को नहीं जानता कि मेरे पुत्रों का, स्त्री का और स्वजनों का कुशल है या नहीं। प्रवृत्तिं स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः। इस समय घर में वे कुशल से रहते हैं, अथवा उन्हें कोई कष्ट है?वे मेरे पुत्र कैसे हैं? क्या वे सदाचारी हैं, अथवा दुराचारी हो गये हैं
NAVRATRI 2024 राजा ने पूछा – जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदि ने धन के कारण तुम्हें घर से निकाल दिया, उनके प्रति तुम्हारे चित्त में इतना स्नेह क्यों है?
वैश्य बोला – आप मेरे विषय में जो बात कहते हैं वह सब ठीक है। अर्थात, जिन लोभी रिश्तेदारों ने वैश्य को धन के लोभ में घर से निकाल दिया, उनके प्रति मन में स्नेह के विचार क्यों आ रहे है।किंतु क्या करूँ, मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता। जिन्होंने धन के लोभ में पड़कर पिता के प्रति स्नेह, पति के प्रति प्रेम तथा आत्मीयजन के प्रति अनुराग को तिलांजलि दे मुझे घर से निकाल दिया है, उन्हीं के प्रति मेरे हृदय में इतना स्नेह है। महामते, गुणहीन बन्धुओं के प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार प्रेम मग्न हो रहा है, यह क्या है – इस बात को मैं जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी साँसें ले रहा हूँ, और मेरा हृदय अत्यन्त दु:खित हो रहा है। उन लोगों में प्रेम का सर्वथा अभाव है, तो भी, उनके प्रति जो मेरा मन निष्ठुर नहीं हो पाता, इसके लिये क्या करुँ
NAVRATRI 2024 मार्कण्डेयजी कहते हैं – तदन्तर राजाओं में श्रेष्ठ सुरथ और वह समाधि नामक वैश्य, दोनों साथ-साथ मेधा मुनि की सेवा में उपस्थित हुए, और उन्हें प्रणाम करके उनके सामने बैठ गए। तत्पश्चात वैश्य और राजा ने कुछ वार्तालाप आरंभ किया।
राजा ने कहा – भगवन् मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, उसे बताइये। । मेरा चित्त अपने अधीन न होने के कारण वह बात मेरे मन को बहुत दु:ख देती है। मुनिश्रेष्ठ, जो राज्य मेरे हाथ से चला गया है उसमें और उसके सम्पूर्ण अंगों में मेरी ममता बनी हुई है। यह जानते हुए भी कि वह अब मेरा नहीं है, अज्ञानी की भाँति मुझे उसके लिये दु:ख होता है, यह क्या है? इधर यह वैश्य भी घर से अपमानित होकर आया है। इसके पुत्र, स्त्री और भृत्यों ने, इसको छोड़ दिया है। स्वजनें चा संत्यक्तस्तु हरदी तथाप्यति। विसमेष और हं च द्ववप्यत्यंतदु ! स्वजनों ने भी इसका परित्याग कर दिया है, तो भी इसके हृदय में उनके प्रति अत्यन्त स्नेह है। इस प्रकार यह तथा मैं दोनों ही बहुत दुखी हैं। जिसमें प्रत्यक्ष दोष देखा गया है, उस विषय के लिये भी हमारे मन में ममता जनित आकर्षण पैदा हो रहा है। महाभाग! हम दोनों समझदार है; तो भी हममें जो मोह पैदा हुआ है, यह क्या है? विवेक शून्य पुरुष की भाँति मुझमें और इसमें भी यह मूढ़ता प्रत्यक्ष दिखायी देती है
NAVRATRI 2024 ऋषि बोले – महाभाग! विषय मार्ग का ज्ञान सब जीवों को है। विषयश्च महाभागयाति चैवं पृथक् पृथक्। इसी प्रकार विषय भी सबके लिये अलग-अलग हैं। कुछ प्राणी दिन में नहीं देखते, और दूसरे रात में ही नहीं देखते। तथा कुछ जीव ऐसे हैं, जो दिन और रात्रि में भी बराबर ही देखते हैं। यह ठीक है कि मनुष्य समझदार होते हैं, किंतु केवल वे ही ऐसे नहीं होते। पशु-पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी समझदार होते हैं। मनुष्यों की समझ भी वैसी ही होती है, जैसी उन मृग और पक्षियों की होती ह
तथा जैसी मनुष्यों की होती है, वैसी ही उन मृग-पक्षी आदि की होती है। यह तथा अन्य बातें भी प्राय: दोनों में समान ही हैं।
समझ होने पर भी इन पक्षियों को तो देखो, यह स्वयं भूख से पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चों की चोंच में कितने चाव से अन्न के दाने डाल रहे हैं। नरश्रेष्ठ, क्या तुम नहीं देखते कि ये मनुष्य समझदार होते हुए भी, लोभवश अपने किये हुए उपकार का बदला पाने के लिये, पुत्रों की अभिलाषा करते हैं?
यद्यपि, उन सबमें समझ की कमी नहीं है, तथापि वे संसार की स्थिति अर्थात जन्म-मरण की परम्परा बनाये रखने वाले भगवती महामाया के प्रभाव द्वारा, ममतामय भँवर से युक्त मोह के गहरे गर्त में गिराये जाते हैं। इसलिये, इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। NAVRATRI 2024 जगदीश्वर भगवान विष्णु की योगनिद्रारूपा जो भगवती महामाया हैं, उन्हीं से यह जगत मोहित हो रहा है।
NAVRATRI 2024 वे भगवती महामाया देवी, ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं। वे ही इस संपूर्ण चराचर जगत की सृष्टि करती हैं, तथा वे ही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिये, वरदान देती हैं। सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये। वे ही पराविद्या, संसार-बंधन और मोक्ष की हेतुभूता सनातनी देवी, तथा संपूर्ण ईश्वरों की भी अधीश्वरी हैं।
राजा ने पूछा – भगवन, जिन्हें आप महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं? ब्रह्मन्! उनका अविर्भाव कैसे हुआ? तथा उनके चरित्र कौन-कौन हैं। ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे, उन देवी का जैसा प्रभाव हो, जैसा स्वरूप हो और जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ हो, वह सब मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूँ।
NAVRAR TRI 2024 ऋषि बोले – राजन्! वास्तव मे तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं। सम्पूर्ण जगत् उन्हीं का रूप है, तथा उन्होंने समस्त विश्व को व्याप्त कर रखा है, तथापि उनका प्राकटय अनेक प्रकार से होता है। वह मुझ से सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं, तथापि जब देवताओं को कार्य सिद्ध करने के लिये प्रकट होती हैं, उस समय लोक में उत्पन्न हुई कहलाती हैं। ॥कल्प (प्रलय) के अन्त में सम्पूर्ण जगत् जल में डूबा हुआ था।
सबके प्रभु भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या बिछाकर योगनिद्रा का आश्रय ले शयन कर रहे थे। उस समय उनके कानों की मैल से दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए, जो मुध और कैटभ के नाम से विख्यात थे।
NAVRATRI 2024 वे दोनों ब्रह्मा जी का वध करने को तैयार हो गये। प्रजापति ब्रह्माजी ने जब उन दोनों भयानक असुरों को अपने पास आया, और भगवान को सोया हुआ देखा, तो सोचा की मुझे कौन बचाएगा। एकाग्रचित्त होकर ब्रम्हाजी भगवान विष्णु को जगाने के लिए, उनके नेत्रों में निवास करने वाली योगनिद्रा की स्तुति करने लगे, जो विष्णु भगवान को सुला रही थी।जो इस विश्व की अधीश्वरी, जगत को धारण करने वाली, संसार का पालन और संहार करने वाली, तथा तेज स्वरूप भगवान विष्णु की अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवी की ब्रह्माजी स्तुति करने लगे।
ब्रह्मा जी ने कहा – देवि तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्वधा और तम्ही वषट्कार हो। स्वर भी, तुम्हारे ही स्वरूप हैं। सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणव में, अकार, उकार, मकार – इन तीन मात्राओं के रूप में तुम्हीं स्थित हो, तथा इन तीन मात्राओं के अतिरिक्त जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है, जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्ड को धारण करती हो। तुम से ही इस जगत की सृष्टि होती है।
NAVRATRI 2024 तुम्हीं से इसका पालन होता है और सदा तुम्ही कल्प के अंत में, सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत की उत्पप्ति के समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-काल में स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्त के समय संहाररूप धारण करने वाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली सबकी प्रकृति हो।
भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ह्रीं और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खङ्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शंख और धनुष धारण करने वाली हो।
NAVRATRI 2024 बाण, भुशुण्डी और परिघ – ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो। सौम्य अर्थात विनम्रता, शीतलता, सुशीलता, कोमलता इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्याधिक सुन्दरी हो। पर और अपर – सबसे परे रहने वाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। कहीं भी सत्-असत् रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो।
ऐसी अवस्था में तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है। जो इस जगत की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान को भी जब तुमने निद्रा के अधीन कर दिया है, तो तुम्हारी स्तुति करने में यहाँ कौन समर्थ हो सकता है। मुझको, भगवान शंकर को तथा भगवान विष्णु को भी तुमने ही शरीर धारण कराया है। अत: तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें है। देवि! तुम तो अपने इन उदार प्रभावों से ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोह में डाल दो, और जगदीश्वर भगवान विष्णु को शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों असुरों को, मधु और कैटभ को, मार डालने की बुद्धि उत्पन्न कर दो।
NAVRATRI 2024 ऋषि कहते हैं – राजन्! जब ब्रह्मा जी ने वहाँ, मधु और कैटभ को मारने के उद्देश्य से, भगवान विष्णु को जगाने के लिए तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी योगनिद्रा की इस प्रकार स्तुति की, तब वे भगवान के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्ष स्थल से निकलकर, अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजी की दृष्टि के समक्ष खडी हो गयी। योगनिद्रा से मुक्त होने पर जगत के स्वामी भगवान जनार्दन, उस एकार्णव के जल में शेषनाग की शय्या से जाग उठे।
फिर उन्होंने उन दोनों असुरों को देखा। वे दुरात्मा, मधु और कैटभ, अत्यन्त बलवान तथा परक्रमी थे क्रोध से ऑंखें लाल किये ब्रह्माजी को खा जाने के लिये उद्योग कर रहे थे।
NAVRATRI 2024 तब भगवान श्री हरि ने उठकर उन दोनों के साथ पाँच हजार वर्षों तक केवल बाहु युद्ध किया। वे दोनों भी अत्यन्त बल के कारण उन्मत्त हो रहे थे। तब महामाया ने उन्हें मोह में डाल दिया। और वे भगवान विष्णु से कहने लगे – हम तुम्हारी वीरता से संतुष्ट हैं। तुम हम लोगों से कोई वर माँगो।
NARATRI 2024श्री भ गवान् बोले – यदि तुम दोनों मुझ पर प्रसन्न हो, तो अब मेरे हाथ से मारे जाओ। बस इतना सा ही मैंने वर माँगा है। यहाँ दूसरे किसी वर से क्या लेना है। ऋषि कहते हैं – उन दैत्यो को अब अपनी भूल मालूम पड़ी। उन्होंने देखा की सब जगह पानी ही पानी है, और कही भी, सुखा स्थान नहीं दिखाई दे रहा है। कल्प – प्रलय के अन्त में सम्पूर्ण जगत् जल में डूबा हुआ था। तब कमलनयन भगवान से कहा – जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो, जहाँ सूखा स्थान हो, वही हमारा वध करो।
ऋषि कहते हैं- तब तथास्तु कहकर, शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान ने, उन दोनों के मस्तक अपनी जाँघ पर रखकर चक्र से काट डाले। इस प्रकार ये देवी महामाया, ब्रह्माजी की स्तुति करने पर स्वयं प्रकट हुई थीं। अब पुनः तुम से उनके प्रभाव का वर्णन करता हूँ, इसका वर्णन दूसरे अध्याय में किया गया है
NAVRATRI 2024
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VITTHAL CHALISA विट्ठल चालीसा का पाठ करने से हृदय पर इसका लाभकारी प्रभाव होता है जिसके फलस्वरुप हृदय की गति हो हृदय की पंपिंग करिया
NAVGRAH CHALISA
NAVGRAH CHALISA नवग्रह चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के कुंडली के समस्त दोष शांत हो जाते हैं जिसके फलस्वरूप उसके जीवन में सुख समृद्धि
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KATYAYANI CHALISA KATYAYANI CHALISA कात्यायनी चालीसा के पाठ से विवाह संबंधी जितनी भी समस्याएं हैं वह दूर होती है शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है
CHAMUNDA CHALISA
Add Your Heading Text Here चामुंडा चालीसा के पाठ से आत्मविश्वास ,साहस में वृद्धि होती है नकारात्मक ऊर्जा भाई और बाधाओ से सुरक्षा मिलती है
SHEETALA MATA CHALISA
SHEETALA MATA CHALISA शीतला चालीसा का पाठ करने से शरीर की बीमारियों से मुक्ति मिलती है मानसिक शांति प्राप्त होती है शीतला माता को आरोग्य
DUTTATREYA CHALISA
DUTTATREYA CHALISA दत्तात्रेय चालीसा का पाठ नियमित रूप से करने से व्यक्ति में आत्मविश्वास की वृद्धि होती है परिवार में प्रेम बना रहता है नकारात्मक
HANUMAN BAHUK CHALISA
HANUMAN BAHUK CHALISA हनुमान बाहुक के पाठ करने से शरीर में पीड़ा गठिया,वात,सर दर्द और जोड़ों के दर्द से मुक्ति मिलती है यह पाठ नियमित
GAYATRI CHALISA
GATATRI CHALISA गायत्री चालीसा के नियमित पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक शांति एकाग्र मन और बुद्धि में वृद्धि होती है इसके साथ ही साथ
BHAIRAV CHALISA
BHAIRAV CHALISA भैरव चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के अंदर जितने भी भय और नकारात्मक शक्तियां और बाधाएं रहती है इन सभी से उसकी
KUBER CHALISA
KUBER CHALISA कुबेर चालीसा का पाठ करने से धन और संपत्ति में बढ़ोतरी होती है आर्थिक तंगी दूर होती है यह शत्रुओं पर विजय दिलाता
chandra chalisa
CHANDRA CHALISA चंद्र चालीसा का पाठ करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है धन और समृद्धि का विकास होता है स्वास्थ्य में लाभ होता है
RAM CHALISA
RAM CHALISA श्री राम चालीसा के पाठ से पूर्ण रूप से शारीरिक मानसिक शांति प्राप्त होती है कार्यों में सफलता मिलती है शत्रु पर विजय
SARSWATI CHALISA
SARSWATI CHALISA सरस्वती चालीसा का पाठ करने से छात्रों को ज्ञान और शिक्षा के साथ ही साथ याद करने की शक्ति में भी वृद्धि मिलती
VISHNU CHALISA
VISHNU CHALISA विष्णु चालीसा का पाठ करने से मानसिक शांति मिलती है घर में सुख समृद्धि आती है जीवन में किए गए पापों से मुक्ति
SHRI KRISHNA CHALISA
SHRI KRISHNA CHALISA श्री कृष्ण चालीसा का पाठ करने से मन में शांति मिलती है धन,वैभव और यश की प्राप्ति होती है साथ ही साथ
SHRI LAXMI CHALISA
SHRI LAXMI CHALISA लक्ष्मी चालीसा का नियमित रूप से पाठ करने से आर्थिक संकटों से मुक्ति मिलती है घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है
RADHA CHALISA
RADHA CHALISA राधा चालीसा का पाठ करने से प्रेम और सौभाग्य की प्राप्ति होती है वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है मानसिक शांति मिलती है
SURYA CHALISA
SURYA CHALISA सूर्य चालीसा का पाठ करने से मान – सम्मान, यश, कीर्ति और व्यक्ति के आत्मविश्वास में बढ़ोतरी होती है साथ ही साथ शरीर
VISHWAKARMA CHALISA
Add Your Heading Text Here विश्वकर्मा चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सफलता आती है व्यापार, कला निर्माण क्षेत्र में उसे प्रगति

Kartik Amavasya 2025, including its date, significance, rituals, story (katha), remedies, spiritual practices, and benefits.
Kartik Amavasya 2025, including its date, significance, rituals, story (katha), remedies, spiritual practices, and benefits. दिनांक एवं समय तारीख: सोमवार, 17 नवंबर 2025 अमावस्या तिथि
GANGA CHALISA
GANGA AARTI गंगा चालीसा का नियम पूर्वक पाठ करने से प्रत्येक अभिलाषा अवश्य पूरी होती है परिवार में खुशहाली रहती है और सकारात्मक का विकास
MA KALI CHALISA
MA KALI CHALISA मां काली चालीसा का पाठ करने से जीवन में सुख समृद्धि के साथ-साथ नकारात्मक ऊर्जा का विनाश होता है नजर दोष जैसी
SHANI CHALISA
SHANI CHALISA शनि के शुभ प्रभावों से धन की लाभ प्राप्ति, कार्यों में सफलता ,न्याय प्रणाली में सफलता ,हड्डियों की मजबूती, बुद्धि में वृद्धि देता
SHIV CHALISA
Add Your Heading Text Here शिव चालीसा का पाठ करने से मानसिक शांति मिलती है और भय से मुक्ति प्राप्त होती है रोगों से छुटकारा
GANESH CHALISA
GANESH CHALISA श्री गणेश चालीसा दोहा जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥ चौपाई जय
DURGA CHALISA
DURGA CHALISA दुर्गा चालीसा का पाठ करने सेआत्मविश्वास में बढ़ोतरी होती है व्यक्ति चिंता से मुक्त हो जाता है शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है
HANUMAN CHALISA
HANUMAN CHALISA हनुमान चालीसा का नियम से पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक रूप से शांति के साथ-साथ शारीरिक व आध्यात्मिक बाल में भी वृद्धि
Santoshi mata chalisa
CHANDRA DEV KI AARTI चंद्र देव की आरती महत्व, लाभऔर नियम चंद्र देव की आरती का महत्व चंद्र देव मन को शांति प्रदान
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KARTIK MAAS KI KATHA ADHYAYA 30 भगवान श्री हरि विष्णु सत्यभामा से बोले -हे प्रिय ! नारद जी के इस प्रकार के वचनों को सुनकर
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KARTIK MAAS KI KATHA ADHYAYA 29 राजा पृथ्वी ने कहा है मुनिवर आपने कलहा द्वारा मुक्ति पाए जाने का समस्त कथा सुनाई जिससे मैंने बहुत

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KARTIK MAAS KI KATHA ADHYAYA 28 धर्म दत्त ने पूछा कि उसने सुना है कि जय और विजय भी भगवान विष्णु के ही द्वारपाल हैं


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