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सूर्य देव की आरती महत्व लाभ और उनके नियम
सूर्य देव का महत्व
१- सूर्य देव को संपूर्ण ब्रह्मांड का जीवन दाता माना गया है।
२- वह प्रकाश ऊर्जा स्वास्थ्य और सफलता के स्त्रोत माने गए हैं। वे सभी ग्रहों के स्वामी है और उनकी कृपा से ही जीवन में तेज उत्साह और प्रगति प्राप्त होती है।
३- सूर्य देवी की पूजा करने से शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं प्राप्त होता बल्कि मानसिक और आत्मिक बल भी प्राप्त होता है। पुराणों के अनुसार सूर्य देव की आराधना करने से कर्मों की शुद्धि आत्म बल की वृद्धि और आयु की वृद्धि होती है।
सूर्य देव की आरती का लाभ
१- सबसे पहले सूर्य देव की आरती करने से पहले स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है। सूर्य की ऊर्जा से रोगों का नाश होता है विशेष रूप से आंखों के रोगों में लाभकारी सिद्ध होता है।
२- नियमित रूप से आरती करने से आर्थिक उन्नति सफलता और समृद्धिप्राप्त होती है।
३- सूर्य देव की आरती करने से आत्मविश्वास और तेज में वृद्धि होती है।
४- आलस्य और नकारात्मकता दूर होती है।
५- समाज में प्रतिष्ठा और आदर प्राप्त होता है।
६- घर में सकारात्मक ऊर्जा और प्रेम का वातावरण सदैव बना रहता है।
सूर्य देव की आरती के नियम
१- सूर्य देव की आरती करने के लिए प्रातः काल सूर्योदय के समय आरती करना चाहिए। स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करके पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्य देव को जल अवश्य अर्पित करना चाहिए।
२- सूर्य देव की आरती करते समय लाल पुष्प ,चावल ,गुड़ , दीपक , लाल वस्त्र ,जल से भरा तांबे का पत्र अवश्य इस्तेमाल करना चाहिए,और यह सभी तांबे के कलश में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में डालकर सूर्य को जल अर्पित करना चाहिए।
३- सूर्य देव को लाल चंदन और गुड़ का भोग अवश्य लगाना चाहिए।
४- आरती करते समय सूर्य की करने को मन से ग्रहण करना चाहिए उन्हें आत्मा में अपने अंदर समाहित होते हुए यह भाव रखना चाहिए साथ ही सूर्य मंत्रो का जाप करना चाहिए।
५- रविवार को उपवास रखना चाहिए और नमक रहित भोजन करें किसी से किसी प्रकार का कटु वचन नहीं करना चाहिए। दान में लाल वस्त्र गेहूं गुड़ और तांबे की वस्तुएं देना शुभकारी होता है।
सूर्य देव की आरती
jai surya dev aarti lyrics
ऊँ जय कश्यप नन्दन, प्रभु जय अदिति नन्दन।
त्रिभुवन तिमिर निकंदन, भक्त हृदय चन्दन॥
॥ ऊँ जय कश्यप…॥
सप्त अश्वरथ राजित, एक चक्रधारी।
दु:खहारी, सुखकारी, मानस मलहारी॥
॥ ऊँ जय कश्यप…॥
सुर मुनि भूसुर वन्दित, विमल विभवशाली।
अघ-दल-दलन दिवाकर, दिव्य किरण माली॥
॥ ऊँ जय कश्यप…॥
सकल सुकर्म प्रसविता, सविता शुभकारी।
विश्व विलोचन मोचन, भव-बंधन भारी॥
॥ ऊँ जय कश्यप…॥
कमल समूह विकासक, नाशक त्रय तापा।
सेवत सहज हरत अति, मनसिज संतापा॥
॥ ऊँ जय कश्यप…॥
नेत्र व्याधि हर सुरवर, भू-पीड़ा हारी।
वृष्टि विमोचन संतत, परहित व्रतधारी॥
॥ ऊँ जय कश्यप…॥
सूर्यदेव करुणाकर, अब करुणा कीजै।
हर अज्ञान मोह सब, तत्वज्ञान दीजै॥
ऊँ जय कश्यप नन्दन, प्रभु जय अदिति नन्दन।
त्रिभुवन तिमिर निकंदन, भक्त हृदय चन्दन॥
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