Amalaki Ekadashi Vrat Katha 2026 /आमलकी एकादशी  व्रत कथा 2026

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Amalaki Ekadashi Vrat Katha 2026

आमलकी एकादशी कब है?

  • आमलकी एकादशी, जिसे आंवला एकादशी भी कहा जाता है, फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में मनाई जाती है। 
  • हिन्दू पंचांग के अनुसार, 2026 में फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 26 फरवरी को सुबह 12:33 बजे शुरू होगी और 27 फरवरी को रात 10:32 बजे समाप्त होगी,
  • इसलिए, आमलकी एकादशी 27 फरवरी 2026, दिन शुक्रवार को मनाई जाएगी। 

आमलकी एकादशी की महिमा

1-आमलकी एकादशी का व्रत करने से साधक को 100 गाय दान करने जितना पुण्य मिलता है. 

2-इस व्रत को करने से साधक जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति पाकर विष्णु लोक को प्राप्त होता है. 

3-आमलकी एकादशी का महत्व अक्षय नवमी के समान होता है. 

4-इस व्रत को करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा मिलती है. 

5-पुराणों के अनुसार, जो लोग स्वर्ग और मोक्ष की कामना रखते हैं, उनके लिए आमलकी एकादशी का व्रत बहुत अच्छा है

 

 

आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha)

एक समय की बात है जब राजा मान्धाता ऋषि वशिष्ठ के आश्रम पहुंचे और उनसे प्रार्थना करने लगे।

राजा मान्धाता – “हे मुनिवर, आप सर्व वेदो के ज्ञाता है। आप मुझ पर कृपा करें और मुझे कोई ऐसी कथा सुनाये की जिससे मेरा पूर्ण कल्याण हो।”

महर्षि वशिष्ठ – “हे राजन, तुमने बड़ा ही उत्तम विचार प्रगट किया है। सर्व कल्याण हेतु आज में तुम्हे एक ऐसी कथा अवश्य सुनाऊंगा। सभी व्रतो में सबसे उत्तम और मनुष्य के अन्तिम समय में उसे मोक्ष प्रदान करने वाली आमलकी एकादशी की कथा आज में तुम्हे सुनाऊंगा अतः इस बड़े ही श्रद्धापूर्वक सुनना।

एक समय की बात है, वैदिश नामक एक नगर हुआ करता था जँहा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी वर्ग के लोग बड़े ही आनंद से अपना जीवन निर्वाह किआ करते थे। वंहा सदैव वेद ध्वनि गुंजार करती थी और इस नगर में पापी दुराचारी और नास्तिक कोई भी न था। उस खुशाल नगर में चैतरथ नामक चंद्रवंशी राजा राज किया करता था। राजा अत्यंत विद्वान और गुणी था। नगर में कोई भी व्यक्ति दरिद्र और कंजूस न था। सभी नगर जन अत्याधिक विष्णु भक्त और वृद्ध, स्त्री -पुरुष सभी एकादशी का व्रत बड़ी श्रद्धा से किया करते थे।

एक दिन फाल्गुन माह के शुक्लपक्ष की आमलिका एकादशी का पर्व आया। उस दिन सभी प्रजाजनों ने हर्ष पूर्वक इस व्रत का अनुष्ठान किया। राजा अपने प्रजा के संग नगर के एक मंदिर में जा कर पूर्ण कुम्भ की स्थापना करते हुए प्रभु को धूप, दीप, नैवेध्य, पंचरत्न आदि से धात्री/अंवाले का पूजन करने लगे और इस प्रकार स्तुति करने लगे।

हे पूज्य ..!! आप परम ब्रह्मास्वरुप हो, स्वयं ब्रह्माजी द्वारा उत्पन्न हुए और सर्व पापो का नाश करने वाले हो, आपको में कोटि कोटि वंदना करता हुँ। अब आप मेरा पूजा स्वीकार करें। आप स्वयं श्री रामचंद्रजी द्वारा पूजनीय हो, मैं आपकी स्तुति करता हुँ, अतः आप मेरे सभी अवगुणो का नाश करे। भगवान धात्री की स्तुति के साथ ही सभी ने उस रात्रि जागरण भी किया।

रात्रि के समय वंहा एक बहेलिया आया, वह अत्यंत पापी और अधर्मी था। वह अपने परिवार का भरण पोषण जीव हत्या करके किया करता था। उस समय भूख-प्यास से अति व्याकुल वह बहेलिया मंदिर में हो रहे जागरण को देखने मंदिर के कोने में जा कर बैठ गया और भगवान श्री हरी की एकादशी कथा का महिमा सुनने लगा। इस तरह वंहा उपस्थित अन्य नगर जनों की भांति उसने भी पूरी रात्रि जागरण करते हुए बिता दी।

प्रातः काल होने पर सभी नगर जन अपने घर को चले गये और वह बहेलिया भी अपने घर को चला गया। घर जाकर उस बहेलिए ने भोजन किया और कुछ समय पश्चात उस बहेलिए की मृत्यु हो गई।

किन्तु आमलिका एकादशी(Amalaki Ekadashi) व्रत के कारण उसने अगले जन्म में राजा विदुरथ के घर जन्म लिया और वह वसूरथ के नाम से जाना गया। आगे जाके युवा होने पर वह चतुरंगिनी सेना और धन धान्य से परिपूर्ण हो कर 10 हज़ार ग्रामो का पालन-पोषण करने लगा।

उसकी प्रतिभा तेज में सूर्य देव के समान, काँटी में चन्द्रमा के समान, वीरता में स्वयं भगवान विष्णु के समान और क्षमा में मा पृथ्वी के समान थी। वह अपने युग में महान धर्मनीष्ठ, सत्यवादी, कर्मवीर और परम विष्णु भक्त था। वह अपनी प्रजा का समान भाव से पालन करता था। वह परम दानवीर था और दान देना उसका नित्य कर्म भी था।

एक दिन राजा आँखेद करने हेतु जंगल में गया। दैवयोग के कारण वह मार्ग भूल गया और दिशा की अज्ञानता के कारण वह एक वृक्ष के तले जा कर सो गया। कुछ ही देर बाद पहाड़ी म्लेच्छ वंहा आ गये, राजा को अकेला देख मारो मारो शब्दों के नारों लगाते हुए राजा की और दौड़े। म्लेच्छ कहने लगे इस दुष्ट राजा ने हमारे सभी सम्बन्धी, माता, पिता, पुत्र, पौत्र की निरापराध हत्या की है और हमें अपने नगर से बाहर निकल दिया है अतः ऐसे दुष्ट राजा को मारना अवश्य चाहिये।

अपना क्रोध राजा के ऊपर निकाल ते हुए वे निशस्त्र राजा की ओर दौड़े और अपने अस्त्र – शस्त्र का प्रहार राजा के ऊपर करने लगे। जितने भी अस्त्र शस्त्र राजा के ऊपर फेके जाते वाह स्वतः ही नष्ट हो जाते और राजा को उन अस्त्रों का वार एक पुष्प के समान प्रतीत हो रहा था। 

अब उन म्लेच्छों द्वारा फेंके जाने वाले अस्त्र और शस्त्र उल्टा उन्हीं को क्षति पहुंचाने लगे और क्षति के मारे वाह स्वयं ही मूर्छित हो कर निचे गिरने लगे। उसी पल राजा के शरीर से एक दिव्य प्रकाश उत्पन्न हुआ और उसमे से एक बहोत ही सुन्दर स्त्री का आगमन हुआ। वह स्त्री सुन्दर अवश्य थी किन्तु उसकी भृकुटी टेढ़ी थी, उनके नेत्रों से एक भयावह अग्नि की ज्वाला प्रगट हो रही थी। वह दूसरे काल से समान दिख रही थी।

राजा पर प्रहार हो रहा देख वह उन म्लेच्छों का संहार करने उनके पीछे दौड़ी और कुछी समय में उसने सभी म्लेच्छों का संहार कर दिया। कुछ समय पश्चात जब राजा जागृत अवस्था में आया तो उसने सभी म्लेच्छों को मरा हुआ पाया। सभी म्लेच्छों को मरा हुआ देख वह आश्चर्यचकित हो उठा और सोचने लगा की इन म्लेच्छों को आखिर किसने मारा होगा? इन निर्जन वन में ऐसा कोन हे जो मेरा हितैषी है जिसने मेरे प्राणों की रक्षा की है? की तभी एक आकाशवाणी हुई – “हे राजन..!! इस संसार में भगवान श्री हरी विष्णु के अतिरिक्त और कौन है जो तुम्हरी सहायता कर सकता है?

इस आकाशवाणी को सुन उसने भगवान श्री हरी विष्णु की स्तुति गाते हुए उनको शष्टांग नमन किआ। अब राजा पुनः अपने राज्य को गया और सुख पूर्वक अपना राज्य करने लगा।

अंत में महर्षि वशिष्ठ बोले – “हे राजन..!! यह आमलकी एकादशी(Amalaki Ekadashi) का प्रभाव था। इस एकादशी का व्रत करने वाला हर मनुष्य अपने सभी कार्यों में निश्चित रूप से सफलता प्राप्त करता है और अपने अंत समय में विष्णुलोक को प्राप्त होते है।

एकादशी माता की आरती (Ekadashi Mata Ki Aarti)

ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता।

विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता॥

ॐ जय एकादशी…॥

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी।

गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी॥

ॐ जय एकादशी…॥

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।

शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई॥

ॐ जय एकादशी…॥

पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है।

शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै॥

ॐ जय एकादशी…॥

नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।

शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै॥

ॐ जय एकादशी…॥

विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी।

पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की॥

ॐ जय एकादशी…॥

चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली।

नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली॥

ॐ जय एकादशी…॥

शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी।

नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी॥

ॐ जय एकादशी…॥

योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।

देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी॥

ॐ जय एकादशी…॥

कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।

श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए॥

ॐ जय एकादशी…॥

अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।

इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला॥

ॐ जय एकादशी…॥

पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।

रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी॥

ॐ जय एकादशी…॥

देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।

पावन मास में करूं विनती पार करो नैया॥

ॐ जय एकादशी…॥

परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।

शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी॥

ॐ जय एकादशी…॥

जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।

जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै॥

ॐ जय एकादशी…॥

EKADASHI KI AARTI

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।

भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥

जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।

सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।

तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥

पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥

तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।

मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।

किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।

अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।

श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥

तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।

तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥

जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।

कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥

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